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________________ प्रस्तावना 63 की सूचना देनेवाले स्वप्नों का वर्णन किया गया है। इस अध्याय में दृष्ट, श्रुत, अनुभूत, प्रार्थित; कल्पित, भाविक और दोपज इन सात प्रकार के स्वप्नों में से केवल भाचिक स्वप्नों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। सत्ताईसवे अध्याय में कुल 13 श्लोत्रा हैं। इस अध्याय में वस्त्र, आसन, पादुका आदि के छिन्न होने का फलादेश बाद सा है ! ह नि निमित्त का विषय है। नवीन बस्त्र धारण करने में नक्षत्रा का फलादेश भी बताया गया है। शुभ मुहूर्त में नवीन वस्त्र धारण करने से उपभोक्ता का कल्याण होता है । मुहूर्त का उपयोग तो सभी कार्यों में करना चाहिए । परिशिष्ट में दिये गये 30वे अध्याय में अरिष्टों का वर्णन किया गया है। मृत्यु के पूर्व प्रकट होने वाले अरिष्टों का कथन विस्तारपूर्वक किया गया है। पिण्डस्थ, पदस्थ और रूपस्थ तीनों प्रकार के अरिष्टों का कथन इस अध्याय में किया गया है । शरीर में जितने प्रकार के विकार उत्पन्न होने हैं उन्हें पिण्डस्थ अरिष्ट कहा गया है। यदि कोई अशुभ लक्षण के रूप में चन्द्रमा, सूर्य, दीपक या अन्य किसी वस्तु को देखता है तो ये सब अरिष्ट मुनियों के द्वारा पदस्थ--बाह्य वस्तुओं से सम्बन्धित कहलाते हैं। आकाशीय दिव्य पदार्थों का शुभाशुभ रूप में दर्शन करना, कुत्ते, बिल्ली, कौआ आदि प्राणियों की दृष्टानिष्ट सूचक आवाज का सुनना या उनकी अन्य किसी प्रकार की चेष्टाओं को देखना पदस्थ अरिष्ट कहा गथा है । पदस्थ अरिष्ट में मृत्यु की सूचना दो-तीन वर्ष पूर्व भी मिल जाती है। जहाँ रूप दिखलाया जाम वहाँ रूपस्थ अरिष्ट कहा जाता है । यह रूपस्थ अरिष्ट छाया पुरुष; स्वप्नदर्शन, प्रत्यक्ष, अनुमानजन्य और प्रश्न के द्वारा अवगत किया जाता है। छायादान द्वारा आणु का ज्ञान करना चाहिए। उक्त तीनों प्रकार के अरिष्ट व्यक्ति की आयु की सूचना देते हैं । भद्रबाहुसंहिता की बृहत्संहिता से तुलना तथा ज्योतिष शास्त्र में उसका स्थान भद्रबाहु संहिता के कई अध्याय विषय की दृष्टि से वृहत्संहिता से मिलते हैं । भद्रबाहु संहिता के दूसरे और तीसरे अध्याय बृहत्संहिता के 33वें अध्याय से मिलते हैं। दूसरे अध्याय में उल्काओं का स्वरूप और तीसरे अध्याय में उल्लाओं का फल वर्णित है । उल्का की परिभाषा का वर्णन कहते हुए बहा है --- भौतिकानां शरीराणां स्वर्गात् प्रच्यवतामिह । संभवश्चान्तरिक्षे तु तज्ज्ञ रूकेति संज्ञिता ।। तत्र वारस तथा धिष्ण्यं विद्युच्चाशनिभिः सह । उल्काविकारा बोद्धव्या ते पतन्ति निमित्ततः ॥ --अ02, श्लो० 5-6
SR No.090073
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 1
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages607
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size13 MB
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