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________________ 424 भद्रबाहुसंहिता तिर्यक मुख संज्ञक- अनुराधा, हस्त, स्वाति, पुनर्वनु, ज्येष्ठा और अश्विनी तिर्यङ्मुख संचक हैं। दान ...-२५८ होगामी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तरापाड़ा, बुधवार को धनिष्ठा, बृहस्पतिवार को उत्तफाल्गुनी, शुक्रवार को ज्येप्या और शनिवार को रेवती दग्धसंजक है। भास शून्य नक्षत्र- चैत में रोहिणी और अश्विनी, वैशाश्व में चित्रा और स्वाति, ज्या 2 में उन्नापाटा और पुष्य, आपा में पूर्वाफाल्गनी और धनिष्ठा, श्रावण में उतरापादा और श्रवण, भाद्रपद में शतभिषा और ग्वती, आश्विन में पूर्वाभाद्र १६, कासित. मासिका और मया, मार्गशीर्ष में निना और विशाखा, पौष में आद्री, अश्विनी और हस्त, माघ में श्रवण और मूल एवं फाल्गुन में 'भरणी और ज्येष्ठा शन्य नक्षत्र है । ___ गंझान्ति प्रवेश के दिन नक्षत्र का स्वभाव और संज्ञा अवगत करको वस्तु की तेजी-मदी जाननी चाहिए। यदि संक्रान्ति या प्रवेश तीक्ष्ण, दग्ध या उन मानक नक्षत्र में होता है, तो सभी वस्तुओं की तजी रामझनी चाहिए। मृदु और भाव मंशक. नक्षयो म संक्रान्ति का प्रवेश होने से समान भाव रहता है। दारुण संज्ञक नक्षत्र में संक्रान्ति का प्रवेश होने से खाद्यान्नों का अभाव रहता है, सभी अन्य उपगोग की वस्तुएं भी उपलब्ध नहीं हो पाती। संक्रान्ति जिभ वाहन पर रहती है, जो वस्तु धारण करती है, जिस वस्तु का भक्षण करती है, उस वरतु नी कमी होती है तथा वह वस्तु महंगी भी होती है । अत: संगाल के वाहनचक्र म भी वस्तुओं की नजी-मन्दी जाना जा सकेगी। रवि नत्र पल-अम्बिनी में रायं के रहने से सभी अनाज, सभी रस, वस्त्र, अलसी, एरण्ड, तिल, मर्धा, लाल चन्दन, इलायची, लोग, भुपारी, नारियल, कपूर, हीग, हिंगलु आदि तेज होती है । गरणी में सूर्य के रहने ना चावल, जौ, चना, मोर, अरहर, अल्लगी, गुड़, बी, फीम, मंग आदि पदार्थ तेज होते है। कृत्तिका मे बत पुष्प, जी, चावल, गहुँ, मूंग, माट, राई और सरसो तेज होत है। रोहिणी में चावल आदि सभी धान्य, अलसी, सरस, राई, सैल, दाख, गुड़, सड़, सुगारी, रुई, वत-जूट आदि पदार्थ तज होत हूँ । मृगशिरा में सूर्य के रहने से जलात्पन्न पदार्थ नारियल, सवंफल, रुई, मूत, रशम, वस्त्र, कपूर, चन्दन, चना आदि पदार्थ तंज होना है। आर्द्रा में रवि का हन स घी, गुड़, चीनी, चावल, चन्दन, लाल नमक, कपास, सहदी, सार, लोहा, थांदी आदि पदार्थ तेज होत है ! गुनर्वसु नक्षत्र में रह से उड़द, मूंग, मार, त्रावल, मसूर, नमक, राज्जी, लाख, नील, सिल, ए२.ण्ड, मांजुफन, मशर, कर, देवदारु, लांग, नारिबल, पर्वत बस्तु आदि गदार्थ महँग होत है। पुष्य नक्षत्र में रबि व रहन स तिल, तेल, मद्य, गुह, ज्वार, गुग्गुल, मुाड़ी, गोट, मोम, हींग, हल्दी, जूट, ऊनी वस्त्र, शीशा, चांदी आदि वस्तुएं लग होती है।
SR No.090073
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 1
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages607
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size13 MB
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