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________________ तृतीयोऽध्यायः सनी चाहिए । मन्दिर के निकटवर्ती वृक्षों पर उल्कापात हो तो प्रशासकों के बीच मतभेद होता है, जिससे देश या राष्ट्र में अनेक प्रकार की अशान्ति फैलती है । पुष्य नक्षत्र में श्वेतवर्ण की चमकती हुई उल्का राजप्रासाद या देवप्रासाद के किनारे पर गिरती हुई दिखलाई पड़े तो देश या राष्ट्र की शक्ति का विकास होता है, अन्य देशों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित होता है तथा देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है। इस प्रकार का उन्कापात राष्ट्र या देश के लिए शुभकारक है । मघा और श्रवण नक्षत्र में पूर्वक्ति प्रकार का उल्कापात हो तो भी देश या राष्ट्र की उन्नति होती है । खलिहान और बगीचे में मध्यरात्रि के समय उक्त प्रकार उल्का पतित हो तो निश्चय ही देश में अन्न का भाव द्विगुणित हो जाता है । शनिवार और मंगलवार को कृष्णवर्ण की मन्द प्रकाशवासी उल्काएँ श्मशान भूमि या निर्जन वन भूमि में पतित होती हुई देखी जाएं तो देश में कलह होता है । पारस्परिक अशान्ति के कारण देश की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था बिगड़ जाती है। राष्ट्र के लिए इस प्रकार की उल्काएं भयोत्पादक एवं घातक होती है । आश्लेषा नक्षत्र में कृष्णवर्ण की उल्का पतित हो तो निश्चय ही देश के किसी उच्चकोटि के नेता की मृत्यु होती है। राष्ट्र की शक्ति और बल को बढ़ानेवाली श्वेत, पील और रक्तवर्ण की उत्काएँ शुक्रवार और गुरुवार को पतित होती हैं। 37 -- कृषिफलादेश सम्बन्धी उल्कापात प्रकाशित होकर चमक उत्पन्न करती हुई उल्का यदि पतन के पहले ही आकाश में विलीन हो जाय तो कृषि के लिए हानिकारक है | मोर पूँछ के समान आकारवाली उसका मंगलवार की मध्यरात्रि में पतित हो तो कृषि में एक प्रकार का रोग उत्पन्न होता है, जिगमे फसल नष्ट हो जाती है। मण्डलाकार होती हुई उल्का शुक्रवार की मन्ध्या को गर्जन के साथ पतित हो तो कृषि में वृद्धि होती है । फसल ठीक उत्पन्न होती है और कृषि में कीड़े नहीं लगते । इन्द्रध्वज के रूप में आपा, विशाखा, भरणी और रेवती नक्षत्र में तथा रवि, गुरु, सोम और शनि इन द्वारों में उल्कापात हो तो कृषि में फसल पकने के समय रोग लगता है इस प्रकार के उल्कापात में गेहूं, जौ, धान और चने की फसल अच्छी होती है तथा अवशेष धान्य की फसल बिगड़ती है । वृष्टि का भी अभाव रहता है। शनिवार को दक्षिण की ओर बिजली चमक तथा तत्काल ही पश्चिम दिशा की ओर उल्का पक्षित हो तो देश के पूर्वीय बाग में बाढ़, तूफान, अतिवृष्टि आदि के कारण फसल को हानि पहुंचती है तथा इसी दिन पश्चिम की ओर बिजली चमके और दक्षिण दिशा की और उल्कापात हो तो देश के पश्चिमी भाग में सुभिक्ष होता है । इस प्रकार का उल्कापात कृषि के लिए अनिष्टकर ही होता है । संहिताकारी ने कृषि के सम्बन्ध में विचार करते समय ।
SR No.090073
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 1
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages607
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size13 MB
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