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________________ 28 भद्रबाहुसंहिता यदि अरको गमन करती हुई उल्का चन्द्र और सूर्य को विदारण करे तो स्थावर - स्थायी नगरवासियों के लिए विपरीत उत्पातों को सूचना देती है ॥42|| अस्तं यातभयादित्यं सोममल्का लिखेद् यदा। आगन्तुबध्यते सेना यथा चोश' यथागमम् ।।43॥ मूर्य और चन्द्रमा के भरत होने पर यदि उल्का दिखलाई दे तो वह आनेवाले पायी कर दिशा में आगन्तुक गना के वध का निर्देश करती है ।। 43।। उदात सोममर्क का यधुल्का प्रतिलोमतः । प्रविकानागराणां त्याद् विस स्तथागते ।।44॥ प्रतिलोम मागं रो गमन करती हुई उल्का उदय होत हुए सूर्य और चक्र मण्डल प्रवण । ती स्थायी आर यायी दोनों के लिए विपरीत फलदायया अर्थात् अम होती है ।।4411 एषवास्तगत उल्का आगन्तनां भयं भवेत् । प्रतिलोमा लयं कुर्याद् यथास्तं चन्द्रसूर्ययोः ।।45॥ गत योग में मय-चन्द्र का अरत समय प्रतिलीम माग गमन करती हुई .. - महल में आकर इ. अस्त हो जाय तो स्थायी और यायी दोनों के निकाय गयोत्पाद है ।। 4511 उदयं भास्करस्योल्का पालो प्रतो भिसर्पति । भोमात्यापि जय कादेषां पुरस्सरावृतिः ॥46।। यदि । सदिय होता गृधे क आगे और चन्द्र के उदय होते हुए बामा माग गरे तथा मा की प्रानि हो तो उसे जयसूचक पाक्षिा 14011 सेनामभिमुखो भूत्वा पशुल्का प्रतिप्रत्यत । प्रतिसनावचं बिन्धात् तस्मिन्नुत्पातदर्शने ॥471 यदि सना के सामन होकर गिरती हुई दिखाई पड़े तो प्रतिसेना (प्रति लीना) का वध की सूधिका समझनी चाहिए ।।4711 1. पथावल :., 1 ग्रंन्यधनी यथा, गुर । 2. लागते । 3. यथैवानमने N, I मन म .. C. 1ो ग्रनो भिसा .. ! 5. गस राति आ० । १. प्रदिश्यत गु
SR No.090073
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 1
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages607
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size13 MB
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