________________ * 761 ., श दों से करू ? बाद में श्रीचन्द्र का सारा चरित्र गुणचन्द्र ने मां को कह सुनाया उसे सुनकर सूर्यवती रानी बहुत ही हर्षित हुई। पदचिन्हों के जानकार पुरुष पद चिन्हों के अनुसार वहां आये और कहने लगे हे मंत्रीश्वर ! दोनों जने ये बैठे हैं / बुद्धिसागर मंत्री ने देदीप्यमान ललाट से युक्त श्रीचन्द्र राजा को नमस्कार किया और विनती की कि हे देव ! पहले आपको देखकर पद्मश्री प्राप पर मोहित हो गई है मेरी पुत्री अमात्य गुणचन्द्र पर मोहित हैं ऐसा जानकर राजा . ने मुझे आपकी शोध के लिये भेजा है और कहलाया है कि वे स्वयंवर में आयें तो पहचान कर वरमाला पहनाना। इतने में नन्दीपुर के हरिषेण राजा की पुत्री तारालोचना द्वारा भेज़ा हुआ तोता तोती का युगल वीणापुर के राजा के पास पहुंचा। राजा की गोद में बैठी हुई राजकुमारी पद्मश्री उन्हें देखकर बेहोश हो . गई हवा प्रादि उपचारों के द्वारा उसे होश आया / राजा के पूछने पर पद्मश्री ने कहो हे तात ! मुझे पूर्व भव का स्मरण हो आया है / . कर्कोट द्वीप में मैं तोती थी वहां से मैं कुशस्थल में सूर्यवतो. रानी के पास आई वहां प्रथम जिनेश्वर के मन्दिर में जिस वर को देख कर मैंने अनशन किया था वे यहां आये हुए हैं उनके साथ ही मैं ब्याह करूंगी ऐसा कहकर उसने भोजन लेना छोड़ दिया। इतने में हरि भाट ने प्राकर कहा कि स्वयंवर मंडप में मैंने श्रीचन्द्र को मित्र सहित देखा है। रात्रि में ही सेना तथा भाट सहित आपकी खोज करने भेजा है मेरे P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust