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________________ PP Ad Gunun MS का वप्रपाप हमें लगेगा।' ज्येष्ठ माता ने कहा-'मैं भी प्रथम प्रहार नहीं कर सकँगा। मुझे भी वज्रपाप का भागी बनना पड़ेगा।' इस प्रकार दोनों भ्राताओं में कुछ समय तक शास्त्र के अनुसार वाद-विवाद होता रहा। सत्य ही है-'मूर्ख मित्र की अपेक्षा विद्वान शत्रु भी उत्तम होता है।' अन्त में दोनों क्रोधी ब्राह्मण-पुत्रों ने विचार किया कि हम दोनों एक साथ ही मुनि पर खड़ग-प्रहार करें। इस विचार से वे आगे बढ़े एवं मुनि की दोनों ओर खड़े हो गये। दोनों दुष्टात्माओं ने अपने नेत्र रक्तवर्णी कर भौंहें वक्र कर ली। उन्होंने यमदतों के रूप में मुनि का वध करने के लिए खड्ग उठाये / किन्तु उस समय एक यक्षपति आकाश में क्रीड़ा करता हुआ जा रहा था। ब्राह्मण-पुत्रों को मुनिराज की हत्या के लिए प्रस्तुत देख कर उसका हृदय करुणा हो गया। उसने सोचा- 'मुनिराज तो ध्यान-मग्न हैं, उन्होंने कोई अपराध नहीं किया। किन्तु ये दुष्ट नीच उनका वध करने के लिए क्यों प्रस्तुत हैं। जिस योगीश्वर की दृष्टि में शत्रु-मित्र समान हैं, जो प्राणीमात्र के हितचिन्तक हैं; वे क्यों इन पापियों के द्वारा निहत हों ? यदि मैं ऐसे महामुनि की रक्षा न कर सकूँ तो मेरा क्षेत्रपाल होना ही व्यर्थ है। अभी मैं इन पापियों को खण्ड-खण्ड कर डालता हूँ।' यह विचार कर यक्षराज उनके निकट आ गया। किन्तु समीप पहुँचते हो उसके हृदय में एक अन्य विचार उत्पन्न हुआ कि इस समय तो उनका वध करना उचित नहीं होगा, कारण कि इन्हें मृत अवस्था में देख कर जनसाधारण को संशय होगा कि मुनि ने ही इनका वध किया है। इससे संसार में मुनि की अपकीर्ति फैलेगी। दिगम्बर जैन मुनियों का अपयश न हो, इस विचार से उसने ब्राह्मण-पुत्रों का वध करना उचित न समझा। यक्षराज ने ब्राह्मण-पुत्रों को उनके राजा एवं अन्यान्य मनुष्यों के सामने प्राणदण्ड देने का निश्चय कर लिया, जिससे उनकी दुष्टता सारे संसार में प्रकट हो जाय। इसलिये यक्षराज उन दोनों भ्राताओं को कोलित कर अपने स्थान के लिय प्रस्थान कर गया। दूसरे दिन सूर्योदय के उपरान्त जब ग्राम निवासी एवं श्रावक मुनि दर्शन के निमित्त भाये, तो उन्होंने देखा कि दो मनुष्य अपने-अपने हाथ में दुधारे खड्ग लिये खड़े हैं, किन्तु क्षेत्रपाल ने उन्हें कोल दिया है,। जिससे वे हिल-डुल भी नहीं सकते थे। यह समाचार चारों ओर फैल गया। इस आश्चर्यजनक घटना को देखने के लिए सारे ग्रामवासी दौड़े बाये। जब लोगों ने ब्राह्मख-पुत्रों को इस नीच-कर्म में प्रवृत्त हुवा देखा, तो Jun Gun Sarana Trust
SR No.036468
Book TitlePradyumna Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSomkirti Acharya
PublisherJain Sahitya Sadan
Publication Year2000
Total Pages200
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size275 MB
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