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________________ सार्थ धम्मि- स्त्रियं / / कदर्थयंति दुराः / पुति पल्लविकदिकाः // 70 // तत्त्वं पुत्रि समर्थापि / पुंसः स्वीकार मर्हसि // अपेदते जात्यमणि-रपि स्वर्णपरिग्रहं // 1 // त्वयदि धम्मिलो यः स / रूपवानेव केवलं // चेद्गुणेष्वनुरक्तासि / गुणज्ञे तदमुं वृणु // 72 // इत्यस्या वचनैः स्वादु-शीतलैः स. ... 536 लिखि // श्रवःप्रविष्टैनिं / धुन्वती कमला जगौ // 3 // मन्ये विस्मृतशीलासि / मातरास नवार्धका || यस्य नाम निषिघापि / यत् श्रावयसि मां सदा // 4 // किं वच्मि पुण्यहीनाई / कागमा कदर्थना करे . // 70 // माटे हे पुत्रि तुं समर्थ तां पण तारे पुरुषनो स्वीकार क. खो लायक डे, केमके जमर्दु मणि पण वर्णना स्वीकारनी अपेक्षा राखे . // 1 // वली तें जे धम्मिलने जोयो रे ते केवल रूपवानज , माटे हे गुणझ! जो तुं गुणोमां रागवाळी हो तो या धम्मिलने वर? // 2 // एवी रीतना तेणीना स्वादिष्ट बने जलसरखां शीतल वचनो कर्णमां जवाथी मस्तक धुणावती कमला बोली के, // 73 / / हे माता! हुं धारं नु के घडपण नजीक श्राव्याथी तुं शीलने विसरी गश् बुं, केमके तने निषेध कर्या बतां तुं मने थानुं नाम हमेशां संगलाव्या करे . // 4 // हुं शुं कहुं ? खरेखर हुं पुण्यहीन डं, केमके देवे मने कल्पवृक्ष दे. P.P.AC.Gunratnasuri M.S. un in Aaradhak Trust
SR No.036432
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages205
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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