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________________ व ज्ञान भंडार आदि खरतरगच्छ की ही धरोहर थी, जिनका निर्माण खरतरगच्छ के गुरु भगवंतों की प्रेरणा से खरतरगच्छ के अनुयायी श्रावकों द्वारा हुआ, उनकी सप्रमाण सूची हमारे द्वारा दिये जाने पर वे तीर्थ व संस्थाएं खरतरगच्छ संघ को सुपुर्द कर दी जायेगी। हमारा समस्त खरतरगच्छ संघ अतीव शांतिप्रिय है। कषाय न करता है, न करवाता है, न चाहता है। अन्यथा एक नहीं, ऐसे अनेक तीर्थों व संस्थाओं के नाम आपको अर्पण किये जा सकते हैं जिनके निर्माण का संपूर्ण श्रेय खरतरगच्छ के गुरु भगवंतों को अथवा उनके आज्ञानुवर्ती श्रावकों को हैं और आज उन पर तपागच्छ का कब्जा है। यह सच्चाई है कि तपागच्छ का कोई भी तीर्थ, मंदिर खरतरगच्छ वालों के पास नहीं हैं। फिर भी दीर्घसंयमी, विद्वद्वरेण्य आपश्री द्वारा गलत आक्षेप लगाते हुए उसे प्रचारित करना, गच्छ-कदाग्रह की मानसिकता को प्रकट करता है। यह शासन-समन्वय और पारस्परिक प्रेम पर आघात करने वाला है। इतिहास के पृष्ठ स्पष्टतः यह सच्चाई बयां करते हैं कि खरतरगच्छ के कितने ही तीर्थ तपागच्छ के अधीन है। मैं आपको कितने उदाहरण दूं- भावनगर का दादा साहब परिसर, कापरडा तीर्थ, खंभात का स्तंभन पार्श्वनाथ तीर्थ, पाटण का बाडी पार्श्वनाथ तीर्थ, कम्पिल तीर्थ, हस्तिनापुर तीर्थ, आयड तीर्थ, उदयपुर का पद्मनाभ स्वामी तीर्थ, देवकुलपाटक तीर्थ, मुंबई का भायखला मंदिर, मुंबई का लालबाग आदि खरतरगच्छ के ही श्रावकों द्वारा निर्मित हैं और खरतरगच्छ के आचार्यों द्वारा ही प्रतिष्ठित है। खरतरगच्छीय कितनी ही रचनाओं में भी मूल रचनाकार का नाम बदल दिया गया है। सुप्रसिद्ध श्री गौतम स्वामी के रास की रचना दादा श्री जिनकुशलसूरि के शिष्य उपाध्याय विनयप्रभ ने की है। इसका स्पष्टीकरण जैन गुर्जर कवियो नामक ग्रन्थ में इसके संपादक सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ श्री मोहनलालजी दलीचंदजी देसाई ने किया है जो स्वयं तपागच्छ की परम्परा के अनुयायी थे। पर तपागच्छीयों ने नाम बदल कर दो तीन और दोहे जोड कर उदयवंत मुनि को रचनाकार के रूप में स्थापित कर दिया है जो कि इतिहास से अप्रमाणित है। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं। हम आपश्री से नम्र निवेदन करना चाहते हैं कि आपने अपने मुद्दों वाले परिपत्र में खरतरगच्छ के प्रति जो झूठा आक्षेप लगाया है, उसका सप्रमाण उत्तर प्रदान करावें। हम नहीं चाहते कि हमारे संघ को किसी भी प्रकार की विरोधात्मक कार्यवाही करने के लिये बाध्य होना पड़े। आशा है, आपश्री इसे गंभीरता से लेते हुए उचित कार्यवाही करेंगे। जिनाज्ञा विरूद्ध कुछ लिखा हो तो मिच्छामि दुक्कडम्। खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरि श्री जिनहरिविहार धर्मशाला, तलेटी रोड पालीताना-३६४२७० गुजरात 99QROOPOST 6666666666666666660 DOOOOOOOOOOOOOK woooooo5600
SR No.035326
Book TitleKhartargacchacharya Jinmaniprabhsuriji Ko Pratyuttar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTejas Shah, Harsh Shah, Tap Shah
PublisherShwetambar Murtipujak Tapagaccha Yuvak Parishad
Publication Year
Total Pages78
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size50 MB
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