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________________ प्रश्नोत्तर एकसोपंदरमो ३५१ तत्रार्थे-सिद्धांतमांहि यति विरसहारी कह्या छइ, वासी आहार लेता कह्या , पंताहारी कह्या, पंताहार वाल चिणा रात्रिना वस्या, एतलइ जइ विण्ठा न हवइ तउ रातिना वस्या वाल चिणा पुणि लियाजि करइ, ए सिद्धांतनो न्याय छइ, वासी ढूंबरथि सिकूरीया चावलादि तपाइ ल्यइ छइ, कुह्या अणकुह्या पूछता नथी जोता नथी, ए आचार नहीं, ते भणी वासीनउ विशेष नहीं, जइ आहार विण्ठा हवइ तउ न लीजइ, जइ विण्ठा न हवइ तउ लीयाजि कीजइ, तथा वासी रोटीमांहि त्रसजीवनी संसक्ति जाणीयइ तउ न लीजइ अन्यथा लेतां दोष को नथी, ते वासी बाटी सचित्त न कहीयइ जेहनउ संघट्टउ टालीयइ, ज इयइ विठी न लीजइ, गीतार्थे पिंडनियुक्तिमांहि त्रससंसक्त मातु प्रमुख आहार लेवानी विधि (कही छइ), जेह यतिनी प्रतीति आवइ तेहनइ एकांते लेई सिद्धांतना पाठ वचाविज्यो, सर्व सममि पडिस्यइ वा सीयपिडं पुराणकुम्मासं' ए सिद्धांत वाक्य विचारिज्यो, उडद ते कठउलमा थाइ, जइ तेई वासी विन्ठा न हवइ तउ पहिलोंका यतितउ लेता, एवं विचारिज्यो, मतानुरागी मत थाउ, सममिज्यो, तपाना कीधा योगविधि ग्रन्थमांहि चोपडीवासी रोटी तप योगमांहि यतिनइ ऊघाडी लेणी कही छइ, अनइ २२ अभक्ष्यांमांहि विन्ठा आहार अभक्ष्य कह्या पुणि वासी आहार अभक्ष्य नथी कह्या, नोज्यो ॥ ११५॥ ભાષા:-સિદ્ધાંતમાં યતિને વિરસાહારી પતાહારી કહ્યા છે. વાસી આહાર લેતા કહ્યા છે, પતાહાર તે કહેવાય કે જે વાલ કે ચણ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035209
Book TitlePrashnottar Chatvarinshat Shatak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuddhisagar
PublisherPaydhuni Mahavir Jain Mandir Trust Fund
Publication Year1956
Total Pages464
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size24 MB
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