________________
२२८
प्रश्नोत्तरचत्वारिंशत् शतक मिथ्यादर्शन शल्यनइ अधिकारि इम कांइ न लिख्यउ ?, परं दृष्टिराग घणूं मूंडा छइ, तथा खरतर मेरुसुन्दरोपाध्यायई छटा प्रश्नोत्तरमांहि लोकोत्तर मिथ्यात्व प्ररूपतां श्रीतिलकाचार्यनी परि पाठ लिख्या छइ ते जाणीयइ २२ सहस्री आवश्यकनी बडीवृत्ति अजोयां एहजि १२ सहस्री वृत्तिना पाठ दीधा, परं बीजा शास्त्रांना उपयोग न दीधा, तिहां वग्गुर सेठइ दीकरानइ काजि श्रीमल्लिनाथनउ देहरउ करायन तेहनी भक्ति जाणी शासन देवतायइ प्रमन्न थइ थकी तेहनइ दीकरउ दीधउ, ए मानणउ जइ मिथात्व थाइ तउ ते देवता प्रविधि पूजायइ किम प्रसन्न थाइ ? परं तीयइ भइयइ जेतलउ मांग्यउ तेहनइ देवतायई तेतल उजि दीधर, एतलइ ते मिथ्यात्व न हवइ, वली श्रीवसुदेव हिडी (लं० १८ पृ० २६७)मांहइ कामपताका नाम श्राविकायइ एहवउ इछणउ श्रीजिनप्रतिमा आगलि कीघ3-'जइ इये नाटकइ हुं जीपूं तउ स्वामी ! हुं ताहरी महापूजा करूं' पछइ कामपताका श्राविकायइ नाटक जीतउ महापूजा कीधी, ए श्राविकानी करणी कहणी? जोज्यो, वली श्रीव्यवहारभाष्यवृत्तिमांहे कह्या छह जे व्यवहारीए श्रावके समुद्रमांहि प्रवहणि बइठां थका दुवाय जोगइ उत्पात थातां ए ईंछणा कर्यउ-'जइ अम्हे समुद्र थकी कुशलई घरे पुहुईं तउ एकइ(बेहुं)रत्नइ श्रीजिनप्रतिमा करा,' पछी ते ममुद्र वांणीये तर्यउ, रत्ननी जिनप्रतिमा करावी, यत उक्तं-"पडिमुप्पत्ती वणीए, उदही उप्पाय वायणं भीतो। रयणदुगे जिणपरिमाउ, करेमि जइ उत्तरेऽविग्धं ॥१॥ उप्पाउवसम उत्तर-णमविग्धं
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com