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________________ आगम (४०) [भाग-6] "आवश्यक - मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+वृत्ति:) ४ अध्ययनं [१], नियुक्ति: [८७१], वि०भा०गाथा , भाष्यं [१५१...], मूलं - गाथा-] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति एवं मलयगिरिसूरिरचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक FANARACC दोहाडेइ, रायापि सत्तमे दिवसे आसचडगरेण नीइ, जामि तं समणगं मारेमि, जाव अण्णेणं आसकिसोरेण सह पुप्फेहि। उक्खिविया खुरेण सन्ना, पादो भूमीए आहतो, ताहे तेण सन्ना मुहमतिगया, तेण णायं-जहा मारिजामि, ततो दंडाणट अणापुच्छाए नियत्तिउमारतो, ते दंडा जाणंति-नूर्ण रहस्सं भिन्नं, जाव घरं पविसइ ताव गेण्हामो, गहितो, इयरो राया आणीतो, तेण कुंभीए सुणए तं च छुभित्ता दारं दिन्नं, हेट्ठा अग्गी पज्जालितो, ते सुणया ताविजता खंडखंडेहिं| छिंदंति, एवं सम्मावातो कायद्यो जहा कालगज्जेणं ॥ तथा चामुमेवार्थमभिधित्सुराह दत्तेण पुच्छिओ जो जन्नफलं कालओ तुरमणीए । समयाइ आहिएणं सम्मं बुइअं भयंतेणं ॥ ८७१ ।। दत्तेन धिगजातिनृपतिना यः कालको मुनिः पृष्टो यज्ञफलं तुरमिण्यां नगर्या, तेन भदंतेन-परमकल्याणयोगिना सम-18 तया आहितेन-मध्यस्थतया गृहीतेन इहलोकभयमनपेक्ष्य सम्यक् उक्त, मा भूचनादधिकरणप्रवृत्तिः ॥ द्वारम् ।। समा४ सद्वारमिदानी, तत्र कथानकम्___ एगो धिज्जाइतो पंडियमाणी, सासणं खिंसइ, सो चाए पइनाए उग्गाहिऊण पराजिणित्ता पचावितो, पच्छा देवयाए|8| चोइयस्स उवागयं, दुगुछ न मुंचति, सन्नायगा य से उवसंता, आगारी से नेहं न छड्डइ, कम्मणं दिन, कहं मे बसे । होज्जा ?, मतो, देवलोगे उववन्नो, सावि तण्णिवेदेण पञ्चइया, अणालोइय चेव काल काऊण देवलोगे उववन्ना, ततो सो चइऊण रायगिहे नगरे धणसत्यवाहो, पंच से पुत्ता, तस्स चिलाइया चेडी, तीसे पुत्तो उववन्नो, नामं च से कयं चिलाइ-18 गोत्ति, इयरीवि तस्सेव धणस्स पंचण्डं पुत्ताणमुवरि दारिया जाया, सुसमा से नाम कर्य, सो य चिलागो तीए बाल-ट। दीप अनुक्रम JanEducation For F lutelu ~-85
SR No.035066
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 2 06 Aavashyak Niryukti evam Vrutti Aagam 40 Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages336
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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