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________________ आगम (४०) प्रत सूत्रांक [-] दीप अनुक्रम [-] [भाग-6] “आवश्यक”- मूलसूत्र - १ (निर्युक्तिः + वृत्तिः) ४ अध्ययनं [१], निर्युक्तिः [८४७], वि० भा०गाथा [-], भाष्यं [ १५०...], मूलं [- /गाथा - ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनिर्युक्ति एवं मलयगिरिसूरिरचिता वृत्तिः श्रीआव श्यकमल य० वृत्ता उपोद्घाते ॥ ४६२ ॥ भणइ-मए अन्नो दिट्ठो, ताहे विवादे सा भणति अहं अप्पाणं सोहेमि, एवं करेहि, ताहे पहाया जक्खधरं गया, तत्थ जो कारी सो दोण्हं जंघाणं अंतरेण बोलंततो लग्गर, अकारी मुच्चइ, जक्वधरं गच्छंती य तेण पुरिसेण पिसायरूवं काऊण अंतरा अवगूहिता, ततो सा तत्थ गंतूण जक्खं भणइ जा मम मायापिईहिं दिण्णलतो तं च पिसायं मोक्षूण जइ अण्णं जाणामि तो मे तुमं जाणसिति भणंती झडत्ति अंतरेण वोलीणा, जक्खो विलक्खो चिंतेइ पेच्छ केरिसं जायं १, अहयंपि वंचितोऽणाए, नत्थि सतित्तणं धुत्तीए, लोगेण उक्किडिकलयलो कतो सुद्धा सुद्धा एमसि थेरो सवेण लोगेण हीलितो, तस्स ताए अद्धितीए निद्दा नडा, एवं रण्णा परंपरएण सुयं जहा थेगे न सुबइ, ततो हकारेऊण अंतेउरपालओ कतो, अभिसेकं च हरिथरयणं रण्णो वासघरस्स हेडा बद्धं अच्छइ, देवी य हरिथमेंठे आसत्तिया, नवरं रसिं हत्थिणा हत्थो पसारितो सा ओयरिया, पुणरवि पभाए पडिविलइया, एवं वच्चइ कालो, तंमि दिणे अतिचिरं जायंति हरिथमेंटेन हत्थिसंकलाए आहया, सा भगइ-सो पुरिसो न सुयइ मा रूसह तं थेरो पेच्छइ, सो चिंतेड़-जइ एयातोवि एरिसीतो किंतु तातो अतिभद्दियातो इति निश्चितो सुत्तो, पभाए सवो लोगो उडितो, सो न उडेइ, रण्णो सिहं, राया भणइ - सुवउ, सत्तमे दिवसे उट्ठितो, रण्णा पुच्छितो, कहियं जहा एगा देवी. न याणामि कयरति सा एवं वबहरइ, ततो रण्णा भिंडमयो हत्थी कारावितो, सङ्घातो अंतेरियाओ भणियातो-एयस्स अच्चणियं करेत्ता उलंडेह, सवाहिं उल्लंडितो, सा नेच्छइ, भणइ-अहं बीहेमि, ताहे राइणा उप्पलेण आहया, मुच्छिया किल पडिया, ताहे से उयगयं जहा एसा कारित्ति, भणिया य मन्त गयमारुहंतीए भिंडमयस्स गयस्स बीहंतीए । इह मुच्छिय उप्पलाया तत्थ न मुच्छिय संकलाहया ॥ १ ॥ जा पिट्ठी से निभा For Frate & Personal Use Only ~52~ अकाम निर्जरायां मेण्ठः | ॥ ४६२ ॥
SR No.035066
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 2 06 Aavashyak Niryukti evam Vrutti Aagam 40 Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages336
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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