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________________ आगम (४०) [भाग-6] "आवश्यक'- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+वृत्ति:) ४ अध्ययनं [१], नियुक्ति: [८४४], वि०भा०गाथा , भाष्यं [१५०...], मूलं F /गाथा-] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति एवं मलयगिरिसूरिरचिता वृत्ति: अनुभवे प्रत चीरी सत्राक श्रीआव-16 से सुइपहदूमणं जाय, भणइ-मए दुक्खिते को मन्ने सुहितो जो एवं गंधवेण रमइत्ति , एवं गणियाए हिएण जणेण श्यकमल- कहियं, सा आगया, पायवडिया रायं पसन्नचंदं विन्नवेइ-देव ! निमित्तसंदेसो मे जातो जो तावसरूवो तरुणो अमुगदिय० वृत्तौद्र वसे अमुगवेलाए गिहं आगच्छेज्जा तस्स तस्समयमेव दारियं देजासि, सो उत्तमपुरिसो, तं संसिया विउलसोक्खभागिणी उपोद्घाते है होहिति, सो य जहा भणिओ निमित्तिणा अन्ज मे गिहमागतो,तं च संदेसं पमाणं करेंतीए दत्ता से मया दारिया, तन्निमित्त ऊसबो, न याणं पुण कुमारं पणहूँ, एत्थ मे अवराह मरिसेहत्ति, रण्णा संदिट्ठा मणुस्सा, जेहिं आरामे कुमारो दिद्वपुबो| ॥४५९॥ तेहिं गएहिं पञ्चभिन्नातो, निवेदितं रणो पियं, ततो राया सयमेव गणियाघरं गतो, दिट्ठो कुमारी चंदोब सोमलेसो, ततो परमपीइमुबहतेण बहुसहितो सगिहमाणीतो, सरिसकुलरूवजोवणगुणाण य रायकण्णाण पाणिं गाहितो, कयरजसंवि18भागो य जहासुहमभिरमइ, रहिगो य चोरदत्तं दधं विकिणंतो रायपरिसेहिं पोरोत्ति गहितो. बक्कलचीरिणा मोइतो पस-1 मचंदविदितं, सोमचंदोऽवि रायरिसी आसमे कुमारं अपस्समाणो सोगसागरावडितो जातो, ततो पसन्नचंदसंपेसिपहिं पुरि-15 सेहिं अम्हेहिं वकलचीरी पोयणपुरे रायसमीचे दिट्ठोत्ति निवेदितेहिं कहवि संठवितो, तहावि निच्चमेव पुत्तमणुसंभरतो अंधो जातो, रिसीहिं साणुकंपेहि कयफलसंविभागो तत्थेव आसमे निवसइ, गएसु य बारससु संवच्छरेसु अडरत्ते पडिबुद्धो पियरं चिंतेउमारद्धो-किह मन्ने तातो मया निग्घिणेण विरहितो अच्छइ ? इति, पिउदसणसमूसुगो पभाए पसन्नचंदसमीवं| |गंतूण विण्णवेइ-देव! विसजेह में उत्कंठितो तायस्स, तेण भणिय-समगं बच्चामो, गया आसमपयं, निवेइयं रिसिणो-पसन्नचंदो पणमइत्ति, चलणोवगतो य अणेण पाणिणा परामट्ठो, पुत्त ! निरामतोसित्ति?, वक्कलचीरी पुणो अवयासितो, चिरका दीप अनुक्रम E ४५९॥ Fur & Fonte #U ~46~
SR No.035066
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 2 06 Aavashyak Niryukti evam Vrutti Aagam 40 Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages336
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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