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________________ आगम (४०) [भाग-6] "आवश्यक'- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+वृत्ति:) ४ अध्ययनं [१], नियुक्ति: [९४९-९५१], विभा गाथा [-], भाज्यं [१५१...], मूलं - /गाथा-], पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति एवं मलयगिरिसूरिरचिता वृत्ति: CHECRESS प्रत सत्राक दीप .श्रीआव-हाऊण रयणीए उवट्ठिया, बिइयदिणे तस्स संवेगो-मए भग्गं वयंति, तीसे जहावट्ठियकहणं, तीसे पारिणामिगी बुद्धीपारिणामिश्यकमल- अमचेत्ति, वरघणुपिया जउघरे कए चिंतेइ-कुमारो कहंपि रक्खियबो, सुरंगाए नीणितो, पलातो, एयस्स पारिणामिगी या उदायगिरीय-1 बुद्धी ॥ अण्णे भणंति-एगो राया, देवी से अइप्पिया कालगया, सो मुद्धो, तीए वियोगदुक्खितो न सरीरस्थितिं करेइ, हरणानि वृत्तौ नम-1 मंतिहिं भणितो-देव ! एरिसि संसारस्थिती, किं कीरउ ?, सो भणइ-नाहं देवीए सरीरस्थिति अकरेंतीए करेमि, मंतीहिं| स्कारे लापरिचिंतियं-न अन्नो उबायोत्ति, पच्छा भणियं-देव! देवी सरगं गया, तत्थट्ठियाए य से सर्व पेसिजउ, लद्धकयदेविट्ठिति-IN दिपउत्तिए पच्छा करेजसु, रण्णा पडिस्सुयं, माइठाणेण एगो पेसितो, रण्णो सगासं सो आगंतूण साहइ-कया सरीस्थिती देवीए, पच्छा राया करेइ, एवं पइदिणं करेंताण कालो बच्चइ, देवीपेसणववएसेण बहुं कडिसुत्चमाइ खज्जई राया, एगेण |चिंतियं-अहंपि खाएमि, गतो रायसगासं, तेण भणिय-कुतो तुम, भणइ-देव ! सग्गातो, रण्णा भणियं-देवी दिट्ठा, सो भणइ-तीए चेव पेसितो कडिसुत्तमाइनिमित्तगंति, दावियं से, जहिच्छियं किंपि न संपडइ, रण्णा भणियं-कया गमि-18 स्ससि ?, तेण भणियं-कलं, ते संपाडिस, मंती आदिवा-सिग्धं संपाडेह, तेहिं चिंतियं-विण8 कज्ज, को एत्थ उवाउत्ति विसण्णा, एगेण भणियं-धीरा होह, अहं भलिस्सामि, तेण संपाडिऊण राया भणितो-देव ! एस कहं जाहिद, रण्णा भणियं-अण्णे कहं जंतगा?, तेण भणियं-अम्हे जं पढता तं जलणप्पधेसेण, न अन्नहा सर्ग गम्मइ, रण्णा भणियं-त- ॥५२९॥ हेव पेसेह, तहा आढत्ता, सो विसण्णो, अण्णो धुत्तो चायालो रणो समक्खं बहुं उवहसइ, जहा देवी भणिज्जासि-सिणेहवंतो राया, पुणोऽवि जं कजं तं संदिसिज्जासि, अण्णं च इमं च बहुविहं भणिज्जासि, तेण भणियं-देव! नाहमेत्तियग अनुक्रम [१] CAEROC JanEducato COM ~186
SR No.035066
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 2 06 Aavashyak Niryukti evam Vrutti Aagam 40 Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages336
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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