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आगम
(४०)
प्रत सूत्रांक
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दीप
अनुक्रम
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[भाग-6] “आवश्यक”- मूलसूत्र - १ (निर्युक्तिः + वृत्तिः) ४
अध्ययनं [१], निर्युक्तिः [ ९१८ ], वि० भा० गाथा [-] भाष्यं [ १५१...], मूलं [- / गाथा-1, पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनिर्युक्ति एवं मलयगिरिसूरिरचिता वृत्तिः
सोयरिएसु मग्गियं, न लद्धं, डिंभरुवं मारियं, सुसंगियं, राया जिमिङमारद्धो, अतीव रुचिरं राया पुच्छइ-कस्स परिसं मंसं ?, न कहर, निध्वंघे कहियं, पुरिसा दिना, मारेहन्ति, नगरेण नातो, भिचेहि य रक्खसोत्ति महुं पाएत्ता अडवीए मुको, चञ्चरे ठितो, धयं गहाय दिणे दिणे माणुसं मारेइ, केई भणंति-विरहे जणं मारेइ, अन्नया तस्संतेण सत्थो जाइ, तेण सुतेण न बेइतो, साहू प आवस्सयं करेंता सत्थातो फिडिया, ते दहूण पिट्ठतो लग्गो, तवेण न सकेइ अकमिडं, चिंतेइ अहो महप्पहावा अमी साहू, संविग्गो, धम्मकहणं, पवज्जा । अन्ने भणति सो भणइ वच्चंते-ठाह, साहू भणति - अम्हे ठिया, तुम चेव ठाहि, चिंते, साइसया आयरिया ओहिनाणी, केत्तिया एवं होहिंति, एवं दुक्खाय जिब्भिदियं ॥
फार्सिदिए उदाहरणं - वसंतउरे नयरे जियसत्तू राया सुकुमालिया भजा, तीसे अतीव सुकुमालो फासो, राया रज्जं न चिंतेइ, सो ताए निच्चमेव परिभुजमाणो अच्छा एवं कालो वच्चइ, मिश्चेहिं समं मंतिऊण तीए सह निच्छूढो, पुत्तो से रज्जे उविओ, ते अडवीए बच्चंति, तिसाइया जलं मग्गइ अच्छीणि से बद्धाणि, मा बीहेहित्ति, सिरारुहिरें पजिया, रुहिरे मूलिया छूढा जेण न थिज्जइ, छुहाइया, ऊरुमंसं दिनं, ऊरुमंसं रोहिणीए रोहियं, जणवयं पताणि, आभरगाणि साचवियाणि, एगत्थ वाणियत्तं करेइ, पंगू य से बीहीए गोवगो घडितो, सा भणइ-न सक्कुणोमि एगागिणी गिहे चिट्ठिउं, विज्जयं लभाहि । चिंतियं च णेण निरवाओ पंगू सोभणो य, ततोऽणेण सो निडुवालो निउत्तो, तेण गीयच्छलियकहाईहिं आवजिया, पच्छा सा तस्सेव लग्गा भत्तारस्त छिदाणि मग्गइ जाहे न उहह ताहे उज्जाणियाए गता, सो वीसत्थो बहुं मज्जं पाएत्ता गंगाए पक्खित्तो, सावि तं दवं खाइऊण तं बहइ, गायति य घरे घरे, पुच्छिया भणइ माया
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