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________________ आगम (४०) प्रत सूत्रांक [-] दीप अनुक्रम [3] [भाग-6] “आवश्यक”- मूलसूत्र - १ (निर्युक्तिः + वृत्तिः) ४ अध्ययनं [१], निर्युक्तिः [९९८ ], वि० भा० गाथा [-] भाष्यं [ १५१], मूलं [- / गाथा-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनिर्युक्ति एवं मलयगिरिसूरिरचिता वृत्तिः आ. सू. ८५ पयाहिणीकरे, चेडीहिं दाइतो, एसोत्ति, सा संभंता ततो गया, पच्छा विरूवं दंतुरं दण भणइ दिऊं से रूवेण चैव वरं गेयं, तीए णिच्छूढं, चेइयं च णेणं, कुसीलवेहिं से कहियं, तस्स अमरिसो जातो, तीसे घरमूले पञ्चसकालसमए गाइडमारद्धो परत्थवइयाए निबद्धं, जहा आपुच्छइ जहा तत्थ चिंतेइ जहा लेहं विसजइ जहा आगतो घरं पविसह, सा चिंतेइ सन्भूयं, | ताए अब्भुट्ठेमित्ति आगासतलातो अप्पा मुक्को, सा मया, एवं सोइंदियं दुक्खाय भवति ॥ चखिदिए उदाहरणं-महुराए नयरीए जियसत्तू राया, धारिणी देवी, सा पयईए धम्मसद्धा, तत्थ भंडीरवणं चेइयं, तत्थ जत्ता, राया सह देवीए नयरजणो य महया विभूतीए निग्गतो, तत्थ एगेण इन्भपुत्तेण जाणसंठियाए देवीए जबणियंतरविणिग्गतो साठत्तगो सनेउरो अईव सुंदरो दिट्ठो चलणो, चिंतियं च पेण-जीए एरिसो चलणो सा रूवेण तियससुंदरणवि अमहिया, अज्झोववण्णो, पच्छा गविट्ठा, का एसत्ति ?, नायं, तग्धरपच्चासन्न बीही गहिया, तीसे दास चेडीणं दुगुणं देइ, महामाणुसत्तणं च दाएइ, ततो हयहिययातो कयातो, देवीए साहति, संववहारो लग्गो, देवीए गंधाई ततो चेव गेहूंति, अन्नया तेण भणियं का एयातो महामोल्लगंधादिपुडियातो छोडेइ ?, चेडीए सिट्ठ-अम्हाणं सामिणित्ति, तेण एगाए पुडि| याए भुजपत्ते लेहो लिहिऊण छूढो, यथा 'काले प्रसुप्तस्य जनार्द्दनस्य, मेघान्धकारासु च शर्वरीषु । मिथ्या न जल्पामि विंशालनेत्रे !, ते प्रत्यया ये प्रथमाक्षरेषु ॥१॥ पच्छा उग्गाहिऊण विसज्जिया, देवीए उग्घाडिया, वाइतो लेहो, चिंतियं चणाएधिरत्थु भोगाणं, पडिलेहो लिहितो, यथा 'नेह लोके सुखं किंचिच्छादितस्यांहसा भृशम् । मितं च जीवितं नृणां तेन धम्मे मतिं कुरु ॥ १ ॥ पादप्रथमाक्षरबद्धो भावार्थः पूर्वश्लोक वदवसेयः, ततो बंधिऊण पुडिया न सुंदरा गंधत्ति विसज्जिया चेडीए, तीए For Private & Personal Use Only ~137~
SR No.035066
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 2 06 Aavashyak Niryukti evam Vrutti Aagam 40 Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages336
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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