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________________ आगम (४०) प्रत सूत्रांक [-] दीप अनुक्रम [3] [भाग-6] “आवश्यक”- मूलसूत्र - १ (निर्युक्तिः + वृत्तिः) ४ अध्ययनं [१], निर्युक्तिः [ ९१८ ], वि० भा० गाथा [-] भाष्यं [ १५१...], मूलं [- / गाथा-1, पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनिर्युक्ति एवं मलयगिरिसूरिरचिता वृत्तिः श्रीआव श्यकमल यगिरीय वृत्तौ नमस्कारे ॥५०२ ॥ भणियं तुन्भं वेव सगासातो सुया देसणा, निवारणं च तीए भणियं अहो ! ते पंडियत्तणं वियारक्खमगं धमयापरिणामो, मया सामण्णेण बहुदोसमेयं भणियंति से उवदिहूं, वारिया य, किमेतावता दुच्चारिणी होइ ?, ततो सो उञ्जितो, मिच्छादुक्कडं से दवावितो, चिंतियं च णाए एस ताब मे कसिणधवलपडियज्जगो, बितिओऽवि एवं चैव विन्नासितो, नवरं सा भणिया- किं बहुणा ?, हत्थं रक्खेज्जासित्ति, सेसविभासा तहेव जाब एसोऽवि मे कसिणधवलपडिवज्जगोत्ति, एत्थ पुण इमाए नियडीए अब्भक्खाणदोसतो तिथं कम्मं निबद्धं, पच्छा एयस्स अपडिक्कमिय भावतो पवइया, भायरोवि से सह जायाहिं पवइया, अहाडगं पालित्ता सुरलोगं गयाणि, तत्थवि अहाउयं पालिता भायरो से पढमं चुया सागेए नयरे असोगदत्तस्स समुद्ददत्तसागरदत्ताभिहाणा पुत्ता जाया, इयरीऽवि चइऊण गयउरे नगरे संखस्स इन्भस्स सावगरस धूया जाया, अतीव सुंदरित्ति सबंगसुंदरी से नामं कयं, इयरीतोऽवि भाउज्जायातो चविऊण कोसलाउरे नंदणाभिहाणरस इन्भस्स सिरिम-कंतिमइनामातो धूयातो आयातो, जोवणं पत्ताणि सवाणि, सबंगसुंदरीवि कहिंपि साकेया गयपुरमागरण असोगदत्तसेट्टिणा दिट्ठा, कस्सेसा कण्णगति कस्सवि समीचे पुच्छियं, नायं संखस्स, ततो सबहुमाणं समुददत्तस्स मग्गिया, लद्धा, विवाहो कतो, कालंतरेण सो विसजायको समुहदत्तो अइगतो, उबयारो से कतो, बासह रं सज्जियं एत्थंतरंमि य सवंगसुंदरीए तं नियडिनिबंधणं पढमकम्मं उदितं ततो भत्तारेण से वासघरट्ठिएण बोलेंती देविगी पुरिसच्छाया दिट्ठा, ततो तेण चिंतियं दुदुसीला मे महिला, कोइ अबलोइडं गतोति, पच्छा सा आगया, न तेण बोलाविया, ततो अट्टदुट्टयाए धरणीए चेव रतिं गमिता, पभाए से भत्तारो अणापुच्छिय सयणबग्गं एगस्स धिजाइगरस For Private & Personal Use Only ~132~ मायायां सर्वांगसुंदरी ॥ ५०२॥
SR No.035066
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 2 06 Aavashyak Niryukti evam Vrutti Aagam 40 Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages336
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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