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आगम
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[भाग-4] "आवश्यक"- मूलसूत्र
अध्ययनं , नियुक्ति: [१८४], विभा गाथा , भाष्यं [३...], मूलं - /गाथा-] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र[४०] मूलसूत्र[१]आवश्यकनियुक्ति एवंमलयगिरिसूरिरचिता वृत्ति:
प्रत
सूत्रांक
जेसे नीला मणी तेसिण मणीणं इमे एयासवे वण्णावासे पण्णते, से जहानामए भिंगेह वा भिंगपत्तेह षा सुएइ पा सुवपिच्छेइ वा चासेइ वा चासपिच्छेन वा नीलीइ वा नीलभेदेइ वा नीलीगुलियाइ वा सामागेइ वा उचंतगेइ वा हल-|| हरवसणेइ वा मोरग्गीवाइवा गवसीकुसुमेह वा अंजणकेसियाकुसुमेइ वा नीलुप्पलेइ वा नीलासोगेह वा नीलपंधुजीवगेइ वा नीलकणवीरेइ वा, भवे एयारवे, नो इणढे समढे, तेणं नीला मणी तत्तो इट्टतरा चेव कंततरा चेव मणुनतरा वेव मणामतरा चेव वझेणं पन्नत्ता, अत्र भृङ्गः कीटविशेषः, पक्ष्मलं भृङ्गपत्रं-तस्यैव भृङ्गाभिधानस्य कीटविशेषस्य पक्ष्म, उच्चंतगो दन्तरागः, इलधरो-बलदेवस्तस्य वसनं हलधरवसनं, तच्च किल नीलं भवति, सदैव तथा स्वभावतया हलधरस्य नीलवस्त्रपरिधानात्, अञ्जनकेशिका-वनस्पतिविशेषः । तत्थ णं जे ते लोहिया मणी तेसि णं मणीणं इमे एयारूवे षण्णावासे पण्णत्ते से जहानामए उरभरुहिरेइ वा ससगरुहिरेइ वा नररुहिरेइ वा वराहरुहिरेइ वा बालिंदगोपगेइ वा बालदिवा
गरेइ वा संझटमरागेइ वा गुंजद्धरागेइ वा जासुमणकुसुमेह वा किंसुयकुसुमेइ वा पारिजातकुसुमेइ वा जायहिंगुलप वा ४ासिलप्पवालेइ वा पवालंकुरेइ वा लोहियक्खमणीइ वा लक्खारसगेइ वा किमिरागकंबलेइ वा चीणपिरासीइ वा रतुप्पले।
वा रचासोगेइ वा रत्तकणवीरेइ वा रत्तवघुजीवेइ वा, भवे एयारूवे !, नो इणढे समहे, ते णं लोहिया मणी एसो इसतरा
व कंततरा चेव मणुण्णतरा च मणामतरा चेव वण्णणं पण्णत्ता, उरभादिरुधिराणि शेषरुधिरेभ्यो लोहितवर्णोत्कटामि भवन्तीति तेषामुपादानं, बालेन्द्रगोपका-सद्योजात इन्द्रगोपका, स हि प्रवृद्धः सन् ईषत्पाण्डुरको भवति ततो बालमहणं, |शिलाप्रवालं-अवालनामा रक्षविशेषः प्रवालापुरा-तस्यैव रक्षविशेषस्याहरातत्य णं जे ते हालिहा मणी तेसिणं मणीणं
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दीप अनुक्रम
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