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________________ दशाश्रुत० छेदसूत्र अन्तर्गत प्रत सूत्रांक / गाथांक [११५] दीप अनुक्रम [११७ -११९] कल्प० ॥ ३१ ॥ “कल्पसूत्रं (बारसासूत्रं) ( मूलम् ) मूलं- सूत्र. [११५] / गाथा || || मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित ...... "कल्प ( बारसा) सूत्रम्" मूलम् उवसग्गा उप्पज्जंति, तंजहा - दिवा वा माणुसा वा तिरिक्खजाणिआ वा, अणुलोमा वा पडिलोमा वा, ते उप्पन्ने सम्मं सहइ खमइ तितिक्खइ अहियासेइ ॥ ११५ ॥ तरणं समणे भगवं महावीरे अणगारे जाए, इरियासमिए भासासमिए एसणासमिए आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिए उच्चारपासवणखेलसंघाणजल्ल पारिट्ठावणियासमिए मण| समिए वयसमिए कायसमिए मणगुत्ते वयगुत्ते कायगुत्ते गुत्ते गुत्तििदिए गुत्तबंभयारी अकोहे अमाणे अमाए अलोहे संते पसंते उवसंते परिनिबुडे अणासवे अममे अकिंचणे छिन्नगंथे निरुवलेवे, कंसपाई इव मुक्कतोए, संखे इव निरंजणे, जीवे इव अप्पडिहयगई, गगणमिव निरालंबणे, वाऊ इव अप्पडिबद्धे, सारयसलिलं व सुद्धहियए, पुक्खरपत्तं व निरुवलेवे, कुम्मे इव गुतिंदिए, खग्गिविसाणं व एगजाए, विहग १ छिण्णसोए (क० कि० ) भ० महावीरस्य केवलज्ञान पूर्वस्थिति ~73~ बारसो | ॥ ३१ ॥
SR No.035040
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 40 Kalpsutra Moolam Chatusharan Tandulvaicharik Gacchachar Mool evam VruttiMool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages394
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_kalpsutra
File Size105 MB
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