________________
दशाश्रुत०
छेदसूत्र अन्तर्गत
प्रत
सूत्रांक/
गाथांक
[१]
दीप
अनुक्रम
[८९]
कल्प०
॥ २४ ॥
“कल्पसूत्रं (बारसासूत्रं) (मूलम्)
मूलं- सूत्र [९१] / गाथा ||-|| मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित ...... "कल्प ( बारसा) सूत्रम्" मूलम्
निप्फंदे निरेयणे अल्लीणपल्लीणगुत्ते आवि होत्था ॥ ९१ ॥ तरणं तीसे तिसलाए खत्ति - याणीए अयमेयारूवे जाव संकप्पे समुप्पजित्था -हडे मे से गब्भे, मडे मे से गब्भे, चुए मे से गब्भे, गलिए मे से गब्भे, एस मे गब्भे पुत्रिं एयइ, इयाणिं नो एयइ त्तिकट्टु ओहयमणसंकप्पा चिंतासोगसागरसंपविट्ठा करयलपल्हत्थमुही अट्टज्झाणोवगया भूमीगयदिट्टिया झियाय, तंपि य सिद्धत्थरायवरभवणं उवरयमुइंगतंतीतलतालनाडइज्जजणमणुखं दीण| विमणं विहरइ ॥ ९२ ॥ तरणं से समणे भगवं महावीरे माऊए अयमेयारूवं अब्भत्थिअं पत्थिअं मणोगयं संकप्पं समुप्पन्नं वियाणित्ता एगदेसेणं एयइ, तरणं सा तिसला खत्ति"याणी हट्टतुट्टा जाव हयहि अया एवं वयासी ॥९३॥ - नो खलु मे गब्भे हडे जाव नो गलिए, | मे गब्भे पुर्वि नो एयइ, इयाणिं एयइ त्तिकट्टु हट्ट जाव एवं विहरइ, तरणं समणे भगवं महावीरे गब्भत्थे चेव इमेयारूवं अभिग्गहं अभिगिण्हइ - नो खलु मे कप्पइ अम्मापिउहिं
~59~
बारसो
॥ २४ ॥