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________________ आगम (३०-७) “गच्छाचार" - प्रकीर्णकसूत्र-७ (मूलं+वृत्ति:) -------------------------------------- मूलं ||८६||--------------- मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित......आगमसूत्र-३०-वृ], प्रकीर्णकसूत्र-[७] “गच्छाचार” मूलं एवं वानर्षिगणि विहिता वृत्ति: श्रीगच्छा आर्यावर्त प्रत सूत्रांक ||८६|| कीरइ बीयपएणं सुत्तमभणियं न जत्थ विहिणा उ । उप्पण्णे पुण कजे दिक्खाआयंकमाईए ॥ ८६ ॥ चारलघु- कीरइ०॥ 'क्रियते' विधीयते "द्वितीयपदेन उत्सर्गपदापेक्षयाऽपवादपदेन 'सुत्तमभणिय'मित्यत्र मकारोऽलाक्षणिकःनम् गा.८६ दसूत्रे-वृहत्कल्पादौ अभणितं-भगवता अकथितं सूत्रभणितं साध्वीपदे न 'यत्र' गणे 'विधिवत्' शास्त्रोक्तप्रकारेण, तुशब्दो |ऽनेकद्रव्यक्षेत्रकालभावप्रकारसूचका, 'उत्पन्ने' प्रकटीभूते पुनः कार्ये महालाभकारणे, किंभूते कार्ये -दीक्षायां गृहीतायां | ॥ २७॥ दीक्षाऽऽतङ्कादिकं तस्मिन् , आदिशब्दाद्विपमविहारादाविति, आतङ्क आदिर्यत्र तत् , स न गच्छ इति ॥ अत्र किञ्चिन्निशीहै थचूर्णिपश्चदशोद्देशकगतं यथा-"एत्थ सीसो पुच्छइ-आगमे व पचावणिजा अजा अतो संसओ किं परियट्टियषाओ न परियट्टियवाओ?, आयरिओ भणइ-णस्थि कोइ णियमो, जहा अवस्सं परियट्टियवाओ णत्थि वत्ति, जइ पुण पषावेत्ता आणाए परिवति तो महानिज्जराए वट्टइ, अह अणाणाए उ पालेइ तो अतिमहामोहं पकुबइ, दीहं संसारं णिवत्तेइ, तो केरिसेण परियट्टियवाओ? को वा परियट्टणे विही ?,अतो भण्णइ-सही भीयपरिसित्ति २,एतेहिं दोहिं पदेहिं चउभंगो काययो, ४|सदू भीयपरिसे १ असहू भीयपरिसो २ सह अभीयपरिसो ३ असर अभीयपरिसो ४, तस्थ धितिबलसंपुण्णी इंदियणिग्ग-1 दाहसमत्थी थिचित्तो य आहारुवहिखेत्ताणि य तप्पाउग्गाणि उपाए समत्थो एरिसो सह १,जस्स भया सबा साहुसाहुणिका सावग्गो ण किंचि अकिरियं करेइ भया कंपइ एरिसो भीयपरिसो २. एत्थ पढमभंगिल्लस्स परिवर्ण अणुण्णार्य, सेसेसु तिसुदा एभंगसु णाणुण्णायं, अह परिय१ति तो चउगुरूं, सो पढमभंगिल्लो जह जिणकप्पं पडिवज्जओ अणुबहावगस्सासात जइ| |जिणकप पडिवज्जइ तो चग्गुरुगा, अपणं च जिणकप्पठियस्स जा णिज्जरा सा उ विहीए संजतीभा अणुपालयतरस विजलतरा णिज्जरा भवति"त्ति ॥८६॥ किञ्च SALASSESSAGES दीप अनुक्रम SHASTRAMSAROKAR [८६) ॥२७॥ ~357
SR No.035040
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 40 Kalpsutra Moolam Chatusharan Tandulvaicharik Gacchachar Mool evam VruttiMool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages394
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_kalpsutra
File Size105 MB
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