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दशाश्रुत०
छेदसूत्र अन्तर्गत
प्रत
सूत्रांक/ गाथांक
[५२]
दीप
अनुक्रम
[ ३२०]
“कल्पसूत्रं (बारसासूत्रं) (मूलम्)
मूलं सूत्र. [५२] / गाथा.||||
मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित ...... "कल्प ( बारसा) सूत्रम्" मूलम्
४ आहारित्तए, बहिया विहारभूमिं वा वियारभूमिं वा सज्झायं वा करित्तए, काउस्सग्गं वा ठाणं वा ठाइत्तए । अत्थि य इत्थ केइ अभिसमण्णागए अहासणिहिए एगे वा अणेगे वा, कप्पइ से एवं वइत्तए - 'इमं ता अजो ! तुमं मुहुत्तगं जाणेहि जाव ताव अहं गाहावइकुलं जाव काउस्सग्गं वा ठाणं वा ठाइत्तए' से य से पडिणिजा, एवं से कप्पइ गाहा - वइ० तं चैव । से य से नो पडिसुणिज्जा, एवं से नो कप्पइ गाहावइकुलं जाव काउस्सग्गं वा ठाणं वा ठाइए ॥५२॥ वासावासं पजोसवियाणं नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अणभिग्गहियसिञ्जासणियाणं हुत्तए, आयाणमेयं, अणभिग्गहियसिज्जासणियस्स अणुच् चाकूइयस्स अणट्ठाबंधियस्स अमियासणियस्स अणातावियस्स असमियस्स अभिक्खणं २ अपडिलेहणासीलस्स अपमज्जणासीलस्स तहा तहा संजमे दुराराहए भवइ ॥ ५३ ॥ अणादाणमेयं, अभिग्गहियसिज्जासणियस्स उच्चाकूइयस्स अट्ठाबंधिस्स मियासणियस्स
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