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________________ आगम (४०) [भाग-३१] "आवश्यक"- मूलसूत्र-१/४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययन [४], मूलं [सू.] / [गाथा-], नियुक्ति: [१२८४] भाष्यं [२०६...], प्रत सूत्रांक (सू.] दीप अनुक्रम [२६] मारिजिहितित्ति सेणियस्स उवणीया खिजिओ (उज्झिया)य, सा जोबणस्था अभयस्म दिण्णा, सा विज्जाहरी अभ-| यस्स इट्ठा, सेसाहिं महिलाहिं मायंगी उलग्गिया, ताहिं विजाहिं जहा नमोक्कारे चक्खिदिय उदाहरणे जाव पञ्चंतेहिं उज्झिया तायसेहिं दिवा पुच्छिया कओसित्ति, तीए कहियं, ते य सेणियस्स पचया तावसा, तेहिं अम्ह नत्तुगित्ति सारविया, अन्नया पविया सिवाए उजेणी नेऊण दिण्णा, एवं तीए समं अभओ वसइ, तस्स पज्जोयस्स चत्तारि रयणाणिलोहजंघो लेहारओ अग्गिभीरुरहोऽनलगिरी हत्थि सिवा देवित्ति, अन्नया सो लोहजंघो भरुयच्छं विसजिओ, ते लोका य चिंतेन्ति-एस एगदिवसेण एइ पंचवीसजोयणाणि, पुणो २ सदाविजामो, एयं मारेमो, जो अण्णो होहिति सो गणिएहिं दिवसेहिं पहिति, एचिरंपि कालं सुहिया होमो, तस्स संबलं पदिपणं, सो नेच्छइ, ताहे विहीए से दवावियं, तत्थवि से विससंजोइया मोयगा दिण्णा, सेसगं संबलं हरियं, सो कइवि जोयणाणि गंतुं नदीतीरे खामित्ति जाव सउणो वारेइ, मार्यतामिति श्रेणिकायोपनीता, रुएका (भवरोधाय), सा यौवन स्थाऽभयाय दत्ता, सा बियाधर्षभयोटा, कोषाभिर्महेलाभिमांतकी भयलगिता, ताभिर्विधाभिषया नमस्कारे चक्षुरिन्द्रियोदाहरणे यावत् प्रत्यन्तै पिसता तापसष्टा पृष्टा-कुतोऽसीति', तथा कधित, ते चणिकस्य पर्वगामापस, सैरसार्क नति संरक्षिता, अभ्यदा प्रस्थापिता सजयिनी नीवा शिवायै दसा, एवं तथा समम भयो वसति, तस्य प्रयोतष पवारि जानि-लोहजो रेखहारकोऽग्निभीरू रथोऽनलगिरिईसी शिवा देवीति, मन्यदा स लोहजहो भृगुक प्रति विसृष्टः, ते कोकान चिन्तयन्ति-एष एफदिवसेनायाति पञ्चविंशतियोजनानि, पुनः पुनः नाम्दापविश्यामह, एनं माश्यामा, बोम्यो भविष्यति स बहभिर्दिनरावास्यति इयचिर पाई सुखिनी भविष्यामः, तसे सम्पर्क प्रदर्ग, स नेच्छति, तदा विधिना (बीच्या) तम दापित, वनापि विषसंयुका मोदकासास्मै दत्ताः, यो शम्बई इतं, स कतिचिद्योजनानि गत्वा नदीतीरे खादामीति यावच्छकुनो धारयति, - - - पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[४०] मूलसूत्र-[१] आवश्यक मूलं एवं हरिभद्रसूरि-रचिता वृत्ति: ~35
SR No.035031
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 31 Aavashyak Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size90 MB
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