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________________ आगम (४०) [भाग-३१] "आवश्यक”- मूलसूत्र-१/४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [५], मूलं ] / [गाथा-], नियुक्ति: [१४६८] भाष्यं [२३१...], प्रत सत्राक आवश्यक- वायाईधाऊणं जो जाहे होइ उक्कडो धाऊ । कुविओत्ति सो पञ्चइ न य इअरे तत्थ दो नत्थि ॥१४६८॥ कायोत्सर्गहारिभ- 18 एमेव य जोगाणं तिण्हवि जो जाहि उक्कडो जोगो । तस्स तहिं निद्देसो इअरे तत्थिक्क दो व नवा ॥ १४६९॥ निक्षेपः द्रीया काएविय अजमपं चायाइ मणस्स चेव जह होइ । कायवयमणोजुत्तं तिविहं अजनप्पमाहंसु ॥१४७०॥ जह एगग्गं चित्तं धारयओ वा निमओ वावि । झाणं होइ नणु तहा इअरेसुवि दोसु एमेव ॥१४७१॥ १७७३॥ देसियदंसियमग्गो वचंतो नरवई लहइ सई । रायत्ति एस बच्चइ सेसा अणुगामिणो तस्स ॥ १४७२ ॥ पढमिल्लुअस्स उदए कोहस्सिअरे वि तिन्नि तत्वन्थि । नय ते ण संति तहियं न य पाहन्नं तहेयंमि ॥१४७३ ।। मा मे एजउ काउत्ति अचलओ काइअं हवइ झाणं । एमेव य माणसियं निरुद्धमणसो हवइ झाणं ॥ १४७४ ॥ वजह कायमणनिरोहे झाणं वायाइ जुन्नइ न एवं । तम्हा वई उ झाणं न होइ को वा विसेसुत्थ? ॥१४७५॥ मा मे चलउत्ति तणू जह तं झाणं निरेइणो होइ । अजयाभासविवजस्स वाइअं झाणमेवं तु ॥ १४७६ ॥ एवंविहा गिरा मे वत्तव्वा एरिसा न वत्तब्वा । इय वेयालियवकस्स भासओ वाइयं झाणं ॥ १४७७ ॥ मणसा वावारंतो कायं वायं च तप्परीणामो। भंगिअसुअं गुणतो बइ तिबिहेवि झामि ॥ १४७८॥ 'देहमतिजडसुद्धी'ति देहजाड्यशुद्धिः-श्लेष्मादिप्रहाणतः मतिजाज्यशुद्धिः तथावस्थितस्योपयोगविशेषतः, 'सुहदुक्खति-IA७७॥ तिक्खय'त्ति सुखदुःखतितिक्षा सुखदुःखातिसहनमित्यर्थः, 'अणुप्पेहा' अनित्यत्वाद्यनुप्रेक्षा च तथाऽवस्थितस्य भवति, तथा| शायद य सुहं झाणं ध्यायति च शुभं ध्यान धर्मशुक्ललक्षणं, एकाग्रा-एकचित्तः शेषव्यापाराभावात् कायोत्सर्ग इति,15 दीप अनुक्रम [३६..] REain A sanayam पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[४०] मूलसूत्र-[१] आवश्यक मूलं एवं हरिभद्रसूरि-रचिता वृत्ति: 'ध्यान' शब्दस्य अर्थ, भेद-आदीनाम वर्णनं ~235
SR No.035031
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 31 Aavashyak Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size90 MB
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