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________________ आगम (४०) [भाग-३१] "आवश्यक”- मूलसूत्र-१/४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [४], मूलं [सू.] / [गाथा-], नियुक्ति: [१४१०] भाष्यं [२२७...] ४ प्रतिक मणाध्या प्रत सत्राक दीप अनुक्रम आवश्यकहारिभ व्याख्या-अभ्यंतरा भूत्रपुरीपादयः, 'तेहिं चेव बाहिरे उवलित्तो न कुणइ, अणुवलित्तो पुण अभितरगतेसुवि तेसु द्रीया है अह अञ्चणं करेइ ॥ १४१०॥ किं चान्यत् आउहियाऽवराहं संनिहिया न खमए जहा पडिमा । इह परलोए दंडो पमत्तछलणा इह सिआ उ ॥ १४११।। ॥७५८॥ ___ व्याख्या-जा पडिमा 'सन्निहिय'त्ति देवयाहिट्ठिया सा जइ कोइ अणाढिएण 'आउट्टिय'त्ति जाणतो बाहिरमल लित्तो तं पडिमं छिवइ अचणं व से कुणइ तो ण समए-खित्तादि करेइ रोग वा जणेइ मारइ वा, 'इय'ति एवं जो असज्झाइए सज्झायं करेइ तस्स णाणायारविराहणाए कम्मबंधो, एसो से परलोए उ दंडो, इहलोए पमत्तं देवया छलेजा, स्यात् आणाइ विराहणा धुवा चेव ॥१४११ ॥ कोई इमेहिं अप्पसत्थकारणेहिं असज्झाइए सज्झाय करेजारागेण व दोसेण वऽसज्झाए जोकरेह सज्झायं आसायणा व का से? को वा भणिओ अणायारो?॥ १४१२॥ व्याख्या-रागेण वा दोसेण वा करेज्जा, अहवा दरिसणमोहमोहिओ भणेज्जा-का अमुत्तस्स गाणस्स आसायणा को या तस्स अणायारो, नास्तीत्यर्थः ॥ १४१२ ॥ तेसिमा विभासा तैरेव बहिरूपकिलो न करोति, अनुपलिया पुनरम्यन्सरगतेपपि सेष्वथार्चना करोति, या प्रतिमा देवताधिषिता सापदि कोऽपि अनादरेण जानानो बारामललिप्ततां प्रतिमा स्पृशति अर्चनं वा तस्याः करोति लाईन क्षमते-क्षिसचित्तादि करोति रोग वा जनयति मारयति वा, एवं योऽस्वाध्याबिके एप तस्य पारलौकिकस्तु दण्डा, हालोके प्रम देवता छलये, आज्ञादिविराधना वैव । कबिदे। मिरप्रशस्तकारगरस्वाध्यापिके साध्यायं कुर्यात् । रामेण बाण का कुर्वान् , अथवा वर्शनमोहमोहितो भणेत्-भमूर्षस्थ ज्ञानस्य काऽऽशातमा ! को वा तखानाचार,तेषामियं विभाषा [२९] ॥७५ar पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[४०] मूलसूत्र-[१] आवश्यक मूलं एवं हरिभद्रसूरि-रचिता वृत्ति: ~206~
SR No.035031
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 31 Aavashyak Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size90 MB
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