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________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति" - उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्ति:) वक्षस्कार [४], ------------------ -------------------- मूलं [१११] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [१११] भीजम्बू- देवो महर्द्धिको यावत्पल्योपमस्थितिकः परिवसति चेत्यध्याहार्य, तेन तत्स्वामिकत्वादेरावतमिति व्यवहियते इति ६ वक्षस्कारे द्वीपशा- निगमनवासं स्वयमम्यूह्यम् ॥ रम्यकादीन्तिचन्द्री-18 निप.१११ या इतिः इति सातिशयधर्मदेशनारससमुल्लासविसयमानऐदयुगीननराधिपतिचक्रवर्तिसमानश्रीजकम्बर॥३८२॥ सुरत्राणप्रदत्तपाण्मासिकसवेंजगज्जन्तुजाताभयप्रदानशत्रुञ्जयादिकरमोचनस्फुरन्मानप्रदानप्रभृतिबहुमानसाम्प्रतविजयमानश्रीमत्तपागच्छाधिराजश्रीहीरविजयसूरीश्वरपदपमोपासनाप्रवणमहोपाध्यायश्रीसकलचन्द्रगणिशिष्योपाध्यायश्रीशान्तिचन्द्रगणिविरचिताया जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्तौ रनमषानामयाँ क्षुद्रहिमवदादिवर्षधरैरावतान्तवर्ष वर्णनो नाम चतुषों वक्षस्कारः ॥ गाथा दीप अनुक्रम [२०९-२११] me - R८॥ अत्र चतुर्थ-वक्षस्कार: परिसमाप्त: भाग जंबूद्वीप-उवंगसूत्र [७/२] मूलं एवं मलयगिरिसूरिजी रचिता टीका परिसमाप्ता: मूल संशोधकः सम्पादकश्च पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज साहेब किंचित् वैशिष्ट्य समर्पितेन सह पुन: संकलनकर्ता मुनि दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D. श्रुतमहर्षि) । ~419~
SR No.035024
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 24 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size104 MB
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