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________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्तिः ) वक्षस्कार [४], --------------------------------------------------------- मूलं [९५] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक वक्षस्कारे यादि सू. शेषविज श्रीजम्बूद्वीपशान्तिचन्द्रीया चिः [९५] ॥३४६॥ गाथा: दहावई कुण्ड गाम कुण्डे पण्णत्ते!, गोअमा! आवत्तस्स विजयस्स पञ्चत्यिमेणं कच्छगाचईए विजयस्स पुरथिमेणं णीलवन्तस्स दाहिणिले णितंये एत्थ ण महाविदेहे वासे दहावईकुण्डे णामं कुण्डे पं० सेसं जहा गाहावईकुण्डरस जाव अट्ठो, तस्स ण दहाबईकुण्डस्स दाहिणणं तोरणेणं दहाबई महाणई पवूढा समाणी कच्छावईआबचे विजए दुइा विभयमाणी २ दाहिणेणं सीखें महाणई समापेड़, सेसं जहा गाहावईए । कहि पं भन्ने! महाविदेहे वासे आवत्ते णामं विजए पण्णत्ते १, गोभमा ! णीलयन्तस्स वासहरपवयस्स दाहिणेणं सीआए महाणईए उत्तरेणं णलिणकूडस्स वक्खारपवयस्स पञ्चस्थिमेण दहावतीए महाणईए पुरस्थिमेणं एस्थ महाविदेहे वासे आवत्ते णामं विजए पण्णते, सेसं जहा कच्छरस विजयस्स इति । कहि गं भन्ते ! महाविदेहे वासे णलिणकूडे णामं बक्सारपब्वए पण्णचे !, गो०! पीलवन्तस्स दाहिणेणं सीआए उत्तरेणं मंगळावइस्स विजयस्स पत्थिमेणं आवत्तस्स विजयस्स पुरथिमेणं एत्थ पं महाविदेहे वासे गलिगकूडे णामं वक्खारपब्बए प्राणचे, उत्तरदाहियए पाईणपडीणविच्छिष्णे सेसं जहा चित्तकूडरस जाव आसयन्ति, णलिणकूड़े णं अन्ते! ऋतिकुटा पं०१, ग्रोअमा! पत्तारि कूड़ा पण्णता, संजहा-सिद्धाययणकूडे णलिणकूढे आवंचकूडे अंपळाबतकडे, ए छुड़ा मामा. रायहाणीनो उत्तरेणं । कहि व भन्ते! महाविदेहे से मंगलावत्ते ग्रामं विजए पण्णते?, गोममा शीलबन्नस बक्सिम्मेण सीमाए इच्चरेवं गठिणहस्स पुरत्यिमे पंकावईए पञ्चत्यिमेणं पत्थ ण मंगलाक्चे णाम बिखए णजे, जहाछमा विजए. बहा एसो आणिग्रन्बो पचन प्रयामते अब देने परिवसइ, से एछामं । कहि भन्ते । महासिवेरे पाई एकाने, हेमा मसाल सिमो पुलकविजयास आत्यिक गोलमाल-भारती, यथा दीप अनुक्रम [१७१-१७३] ॥३४६॥ ~347
SR No.035024
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 24 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size104 MB
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