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________________ आगम (१४) [भाग-१७] “जीवाजीवाभिगम” – उपांगसूत्र-३/२ (मूलं+वृत्तिः ) प्रतिपत्ति: [३], ----------------------- उद्देशक: [(द्वीप-समुद्र)], -------------------- मूलं [१३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित...आगमसूत्र-[१४], उपांगसूत्र-३] "जीवाजीवाभिगम" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: * - % श्रीजीवाजीवाभि मलयगिरीयावृत्तिः *- प्रत सूत्रांक [१३९] *- ३ प्रतिपत्तो मनुष्या० सिद्धायतनाधि *- | उद्देशः२ ॥२३२॥ -* सू०१३९ दीप अनुक्रम [१७७] -- सत्र-१३९ सभाए णं सुधम्माए उत्तरपुरस्थिमेणं एस्थ णं एगे महं सिद्धायतणे पपणत्ते अडतेरस जोयणाई आयामेणं छजोयणाई सकोसाइं विक्खंभेगं नव जोयणाई उहूं उपत्तेणं जाव गोमाणसिया बत्तब्बया जा चेव सहाए सुहम्माए बत्तव्बया सा चेव निरवसेसा भाणियब्बा तहेव दारा मुहमंडवा पेच्छाघरमंडवा झया धूभा चेइयरक्खा महिंदज्झया गंदाओ पुक्खरिणीओ, तंओ य सुधम्माए जहा पमाणं मणगुलियाण गोमाणसीया धूवयघडि ओ तहेव भूमिभागे उल्लोए य जाच मणिफासे ॥ तस्सणं सिद्धायतणस्स बहुमझदेसमाए एत्य णं एगा महं मणिपेढिया पण्णत्ता दो जोयणाई आयामविक्खंभेणं जोयणं बाहल्लेगं सब्वमणिमयी अच्छा०, तीसे णं मणिपेढियाए उपि एत्थ एगे मार देवच्छेदए पपणत्ते दो जोवणाई आयामविखंभेणं साइरेगाई दो जोयणाई उहूं उच्चत्तेणं सव्वरयणामए अच्छे ॥ तस्थ णं देवच्छेदए अट्ठसतं जिणपडिमाणं जिणुस्सेहप्पमाणमेत्ताणं संणिखित्तं चिट्टा ॥ तासि णं जिणपडिमाणं अवमेयारवे वण्णावासे पण्णत्ते, तंजहातवणिजमता हत्धतला अंकामयाईणक्खाई अंतोलोहियक्वपरिसेयाई कणगमया पादा कणगामया गोप्फा कणगामतीओ जंघाओ कणगामया जाणू कणगामया ऊरू कणगामयाओ गायलट्ठीओ तवणिजमतीओ णाभीओ रिट्ठामतीओ रोमरातीओ तवणिजमया चुचुया तवणिजमता सिरिवच्छा कणगमयाओ बाहाओ कणगमईओ पासाओ कणगमतीओ गीवाओ रिहामते मंसु 44-4-NCRACHA -*-- --- ॥२३२॥ -- Jaticiandi अत्र मूल-संपादने शिर्षक-स्थाने एका स्खलना वर्तते-द्वीप-समुद्राधिकार: एक एव वर्तते, तत् कारणात् उद्देश:- '२' अत्र २ इति निरर्थकम् अत्र द्वितीय भागे द्वीप-समुद्र अधिकारे सूत्र-१३९ आरभ्यते, तन्मध्ये सिद्धायतन अधिकारः, शाश्वत-जिनप्रतिमा अधिकारः वर्तते ~12
SR No.035017
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 17 Jivajivabhigam Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages488
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jivajivabhigam
File Size118 MB
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