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________________ आगम (१२) प्रत सूत्रांक [४२] + गाथा दीप अनुक्रम [५२-५४] मूलं [४२] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र -[११], अंगसूत्र [११] विपाकश्रुत" मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्तिः औपपातिकम् ॥१०८॥ भाग-१४ “औपपातिक” - उपांगसूत्र - १ ( मूलं + वृत्ति:) Education Inte हणंति ? कम्हा णं केवली समुग्धायं गच्छति ?, गोयमा ! केवलीणं चत्तारि कर्म्मसा अपलिक्खीणा भवंति, तंजहा-बेयणिजं आउयं णामं गुतं सव्वबहुए से वैयणिले कस्मे भवइ, सब्वत्थोवे से आउए कम्मे भवइ, विसमं समं करेइ बंधणेहिं ठिईहि य, विसमसमकरणयाए बंधणेहिं ठिईहि य एवं खलु केवली समोहति एवं खलु केवली समुग्धायं गच्छति । सव्वेवि णं भंते । केवली समुग्धायं गच्छति ?, णो इणट्टे समडे, 'अकित्ता णं समुग्धार्य, अनंता केवली जिणा । जरामरणविप्पमुक्का, सिद्धिं वरगई गया ॥ १ ॥ कइसमए णं भंते! आउजीकरणे पण्णत्ते ?, गोयमा ! असंखेजसमइए अंतोमुहुत्तिए पण्णत्ते । केवलिसमुग्धाए णं भंते! कसमइए पण्णत्ते ?, गोपमा ! असमइए पण्णसे, तंजा-पढमे समए दंड करेड़ चिइए समए कवाडं करेइ तईए समए मंथं करेह चउत्थे समए लोय पूरेइ पंचमे समए लोयं पडिसाहरइ छठे समए मयं पडिसाहरइ | सत्तमे समए कवाडं पडिसाहरण अट्टमे समए दंडं पडिसाहरइ पडिसाहरिता तओ पच्छा सरीरत्थे भवइ । | सेणं भंते! तहा समुग्धायं गए किं मगजोगं जुंजइ ? वयजोगं जुजइ ? काययोगं जुंजइ ?, गोयमा ! णो मण| जोगं जुंजइ णो वयजोगं जुजइ कायजोगं जुंजह, कायजोगं जुंजमाणे किं ओरालियसरीरकायजोगं जुजइ ? | ओरालियमिस्ससरीर कायजोगं जुंजइ ? वेडव्वियसरीरकायजोगं जुजइ ? वेडब्बियमिस्ससरीरकायजोगं जुंजइ ? आहारसरीरकायजोगं जुजइ ? आहारसरीर मिस्सकायजोगं जुजद ?, कम्मासरीरकायजोगं जुजइ ?, | गोपमा ! ओरालिय सरीरकायजोगं जुंजइ, ओरालियमिस्ससरीरकायजोगंपि जुंजह, णो वेडव्वियसरीरका For Park Use Only ~355~ समुद्घा० सू०४२ ॥१०८॥
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
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