SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 71
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (४७) काणा कहना, लंगड़ेको लंगड़ा कहना यदि कोई व्यभिचारी हो तो उसे व्यभीचारी कहना यही सम्यग्दृष्टिका धर्म है. और अंधेको अंधा, काणेको काणा, लंगड़ेको लंगडा और व्यभिचारी को व्यभीचारी न कहे तो मिथ्यादृष्टि ! क्यों साहब ! पंनालालजी! श्रीवुवि० की धन्यबुद्धिसें ऐसाही होता हैं न? (पंडितजीसें ) आपके शास्त्रमेंभी क्या यही बात दर्ज है, कि अंधेको अंधा कहकर पुकारना ? पंडि०-साहब! हमारे शास्त्रमेंतो ऐसा नहीं है. वकी०-पमालालजी साहब ! आपसे मुझे दर्यापित करना है कि-इस चंडां शुं चंडको आप सत्य मानते हो या झूठ? पन्ना०-हमतो इसे सत्य मानते है. __ वकी०-अच्छा तो इसमें बतलाई हुई चैत्रमासादिकोंकी वृद्धि सत्य है न? . पत्रा०-हां सत्यही है. वकी०-जब जैनशास्त्रकारोंका यह फरमाना है कि आषाढ और पौष महिनोंके सिवाय अन्य कोईभी मास बढ़ता नहीं है तबतो यह बात असत्यही रही न? पन्ना०-नहीं एसा नहीं जैनपंचांग की अविद्यमानता होनेसे अन्यपंचांगकी अपेक्षासें यह बात सत्य है. वकी०-अच्छा तव जैन शास्त्रानुसार तो आषाढ़ और पौष मासके सिवाय अन्य महिनाओंकी वृद्धि नहीं होते हुवे अन्य महिनोंकीभी वृद्धि मानने व बोलनेवाले जंबुवि० को सम्यग् Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034996
Book TitleParvtithi Prakash Timir Bhaskar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrailokya
PublisherMotichand Dipchand Thania
Publication Year1943
Total Pages248
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy