SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 62
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (३८) एन्द्र--(पढ़ते है) "तिहिवाए" तिथिपाने तिथिक्षये पूर्वैव तिथिह्या, अधिकायां च वृद्धौ चोत्तरैव ग्राह्या, उपादेयेत्यर्थः अर्थ:-तिथिके क्षयमें पहली तिथिही ग्रहण करना और वृद्धि में दूसरी तिथिही ग्रहण करना. यदुक्तं क्षये पूर्वातिथि ह्या वृद्धौ ग्राह्या तथोत्तरा। श्रीमद्वीरस्य निर्वाणं ज्ञेयं लोकानुसारतः ॥ १॥ अर्थः- कहा है कि-क्षय में पहली तिथि ग्रहण करना वृद्धि में दूसरी तिथि ग्रहण करना श्रीमान् वीरप्रभुका निर्वाण (दीपालि का ) तो लोकानुसारसें जानना. " एतच्च आवयोरपि सम्मत्तमेव " अर्थ:-यहतो तुम और हम दोनोहीको मान्य है. " अथैवमङ्गीकृत्यापि कश्चिद् भ्रांत्या स्वमतिमांद्याचाष्टम्यादि तिथिक्षये सप्तम्यादिरूपा प्राचीनातिथिः चतुर्दशी क्षये चोत्तरा पंचदशी ग्राह्येत्येवं रुपमधजरतीयन्याय मनुसरति, तमेवाधिकृत्योत्तराईमाह." अर्थः-इस प्रकार मंजुर करकेभी कोई, भ्रान्तिसें या मतिकी मंदतासें अष्टमी वगैरह तिथिक्षयमें पहली तिथि और चतुर्दशीके क्षयमें पिछली (बादकी) तिथि-पूर्णिमाको ग्रहण करने रुप अर्धजरतीय न्यायको अनुसरता है, उसीके लिये उत्तरार्ध गाथासे कहते है कि - "क्षीणमपि पाक्षिक चतुर्दशी लक्षणं पूर्णिमायां प्रमाणं न कार्य, तत्र तद्भोगगंधस्याप्यसंभावात् , किन्तु त्रयोदश्यामेवेत्यर्थः दृष्टान्तनिवद्धा युक्तयश्चात्र पुरो वक्ष्यन्ते इति" अर्थ क्षय ऐसी चतुर्दशी पूर्णिमांके अंदर प्रमाण नहीं Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034996
Book TitleParvtithi Prakash Timir Bhaskar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrailokya
PublisherMotichand Dipchand Thania
Publication Year1943
Total Pages248
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy