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________________ (१९१) नाशी छूटेल छे. आवानो आपने पक्ष होवा छतां एवा घृणास्पद मार्गनुं शरण आपतो नहिंज ल्यो एवी मारी धारणा हो. वाथी आ पत्र आपने लखेल छे तो पत्रनो जवान अने वाटाघाट माटे टाइम जरुर आपशो. आपना खुलासानी चार दिवस राह जोइश. ता. कः-आप गारीयाधार वधु रोकावाना न हो अने उतावले अहिं पधारवाना हो, तो छेवट फागण सुदि १ के बीजना दिने अत्रे चर्चा माटे पण टाइम आपवानुंज ध्यानमा राखशो. लि. मुनि हंससागर. इसके बाद फागण मुदि २ के दिन जंबुविजयजी वापिस पालीताणे आये, तो फिरभी शुक्लतृतीयाको दसरा पत्र मुनिश्री हंससागरजीने उनको भेजा, उसको भी मैं पढ़ता हूं सुनिये ! स्थल-बाबु पन्नालालनी धर्मशाला फा० सु. ३ भोम श्रीमान् उ० जंबुविजयजी, योग्य वंदनपूर्वक जणाववानुं जे तिथिचर्चा माटे तमारी पासे तमारूं जुट्टाणुं साबीत करवा हुँ आवती काले आq छु. . . इस पत्रको लेनेका जं० वि० ने साफ इनकार किया, और जो कोईभी उनसे पुछता उनको तो कहते कि-इसमें जवाब देने की आवश्यकता ही क्या है ? यहांपरतो द्वार हरवक्त खुल्ले ही रहते है, चीठां क्यों भेजते है ? यहांपर हमने Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034996
Book TitleParvtithi Prakash Timir Bhaskar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrailokya
PublisherMotichand Dipchand Thania
Publication Year1943
Total Pages248
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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