SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 12
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ बहुत समय पश्चात् "उन लोगों ने अपने वेद भी अन्तग बना लिये पहले तो जैन वेद अर्थात् आगम निगम ही प्रचलित थे । संवत् १२२० में महाराजा कुमारपाल ने अपने उपकारी गुरु श्री हेवचन्द्राचार्यजी से प्रार्थना की कि वैदिक महाणा व जैन महाणामों की धर्म विपरीतता व शास्त्र भिन्नता से प्राचार विचारों में परिवर्तन है अतः इनका उपयुक्त नया नाम नियुक्त करें जिससे पहचानने में सरलता रहे तब उन्होंने महाणा से 'महात्मा शब्द घोषित किया । जिनका कार्य ज्योतिष, वैद्यक पढना पढाना है । साथही साथ जैन जाति के इतिहास का भार भी इन पर ही है । श्री रत्नप्रभसूरीश्वर ने ओसियानगरी में प्रोसवाल बना कर अलग अलग गौत्र कायम किये उन सबके लिये अलग अलग कुलगुरु मुकर्रर हुए जो आजतक चले आते हैं । महात्मा लोग आज भी अपने गृहस्थ शिष्यों का इतिहास रखते अपने पास हैं। जिसकी मान्यता सरकार भी करती है । पूर्व परम्परा से अाज तक इस जाति में महान उपकारी राज्य सत्ताधारी राजगुरु होते आ रहे हैं। प्रथम नन्द का मन्त्री कल्पक जैन ब्राह्मण था, नवम नन्द का मन्त्री शकटाल व उसके पुत्र स्थूलिभद्र, श्रीयक व सेणा वेणा जक्खा श्रादि पुत्रियां जैन ब्राह्मण महाणा थीं । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034946
Book TitleMahatma Jati ka Sankshipta Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages120
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy