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________________ (६४) पढ़ावें देखें जो लिखि लिखि तथा ग्रन्थ लिखवा । लहें ते निश्चै सो अमर पदवी मोक्ष अथवा ॥ ( यह सरस्वती स्तवन पढ़कर पुष्प क्षेपण करें।) गौतम स्वामीजी को अर्घ्य । गीतमादिक सर्वे एक दश गणधरा । वीरें जिन के मुनि सहस चौदस वरा ॥ वीर गंधाक्षत पुष्प चरु दीपक । घूप फल अध्य ले हम जजें महर्षिकं ॥ ओं हां महावीर जिनस्य गौतमाय कादशगणधर चतुर्दश सहस्त्र मुनिवरेभ्योऽध्यम् निर्वपामि स्वाहा । इस प्रकार अर्घ्य चढाकर लाभ आदि में विघ्न करनेवाले अन्तराय कर्म को दूर करने के लिये नीचे लिखा हुआ पद्य पढे। अन्तरायनाशार्थ अर्घ्य । लाम की अंतराय के वश जीव सु ना लहै। जो करे कष्ट उत्पात सगरे कर्मवश विरथा रहे ॥ नहिं जोर वाको चले इक छिन दीनमो जगमें फिरे । अरहंत सिद्धसु अधर धरिके लाम यों कर्म को हरे ।। ओं ही लाभांतरायकमरहिताभ्यां . अर्हत् सिद्धपरमेष्ठिभ्यां अय॑म् निर्वपामि स्वाहा । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034887
Book TitleJain Vivah Vidhi aur Vir Nirvanotsav Bahi Muhurt Paddhati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathulal Jain
PublisherDhannalalji Ratanlal Kala
Publication Year1953
Total Pages106
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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