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________________ (५४) त्रिभुवन के स्वामी त्रिभुवन नामी अन्तरजामी अभिरामी। शिवपुर विश्रामी निज निधिपामी सिद्धजजामि सिरनामी। ओं ह्रीं अनाहत पराक्रमाय सर्व कर्मविनिमुक्ताय सिद्धपरमेष्ठिने अय॑म् निर्वपामि स्वाहा। चावीस महाराज का अर्घ्य । जलफल पाठों शुचिसार, ताको अर्घ करों। तुमको अरपों भवतार, भव तरि मोक्ष 'वरों ॥ चौबीसों थी जिनचन्द, आनन्द कन्द सही । पदजजत हरत भव फन्द पावत मोक्षमही ॥ ओं ही श्री वृषभादिवीरांतचतुर्विंशति तीर्थकरेभ्यो अध्यम् निर्वपामि स्वाहा । श्री महावीर जिनपूजा। [कविवर वृन्दावन कृत] छन्द मत्तगयंद । श्रीमतवीर हरै भवपीर भर सुखसीर अनाकुलताई । केहरि अंक अरीकर दंक नये हरि पंकति मौलिसुहाई ॥ मैं तुमको इत थापत हों प्रभु भक्ति समेत हिये हराई । हे करुणा धन धारक देव, इहां अब तिष्ठहु शीघ्रहि आई ॥ ओं ही श्री वर्धमान जिनेन्द्राय पुष्पांजलिः। (छन्द अष्टपदी) - बीरोदधि सम शुचि नीर, कंचन श्रृंम मरों। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034887
Book TitleJain Vivah Vidhi aur Vir Nirvanotsav Bahi Muhurt Paddhati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathulal Jain
PublisherDhannalalji Ratanlal Kala
Publication Year1953
Total Pages106
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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