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________________ (४७) अनेक प्रकार की आशंकाओं को दूर करने की दृष्टि से अच्छा है I विवाह के मुहूर्त निकालने आदिमें और अन्य ग्रहादिदोष को दूर करने के लिए जो पीली पूजा आदि शांति के उपायअन्य ज्योतिषी बताते हैं उनके उपाय जैनशास्त्रानुसार ही करना चाहिए | नवग्रह विधान के अनुसार विवाह के समय जिनेन्द्र पूजा करा देना चाहिए और विशेष करना हो तो नवग्रह मंडल मंडाकर “ श्रीं ह्रीं अर्ह असि आउ सा नमः सविघ्न शांतिं कुरु कुरु स्वाहा इस मन्त्र की ग्रह के हिसाब से यथाशक्ति जाप्य करा देना चाहिए । ," घर की ओर से कन्या के प्रति ७ बचनों में (पृष्ठ ३४ पर) छठे और सातवें बचन के भीतर परपुरुषगमन का त्याग सामिल है । ये प्रतिज्ञायें इसी दृष्टि से कराई गई हैं। (७) बिनायक यन्त्र पूजा ( पृष्ठ १६ ) आदि के प्रारम्भ में यन्त्राभिषेक और आह्वानन आदि विनय और शुद्धि को ख्याल में रखकर ही नहीं लिखे गये हैं । इसीप्रकार विनायक यन्त्र पूजाकी जयमाला (पृ. २१) में चौथा पांचवा पद्य समयानुसार कम कर दिया है । नव दम्पति के प्रति । आप दोनों गार्हस्थ्य जीवनमें प्रविष्ट हुए हैं। अपने मानव जीवन को पवित्र और सफल बनाने के लिए ही यह क्षेत्र आपने चुना है । इसको आनन्द पूर्ण और सुखमय बनाना आपके ही ऊपर निर्भर है। यह केवल इंद्रिय भोग मायने के लिए नहीं, वरन् संयम पूर्वक सदाचार और शीड की साधना Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034887
Book TitleJain Vivah Vidhi aur Vir Nirvanotsav Bahi Muhurt Paddhati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathulal Jain
PublisherDhannalalji Ratanlal Kala
Publication Year1953
Total Pages106
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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