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________________ (३३) ग्रंथिबन्धन मंत्र । श्रस्मिन् जन्मन्येष बन्धो द्वयोर्ते, कामे धर्मे वा गृहस्थत्वभाजि । योगो जातः पंचदेवाग्नि साक्षी, जायापत्त्योरंचल ग्रंथिबंधात् ॥ हथलेवा (पाणिग्रहण) । गठजोडा के पश्चात् कन्या के पिता कन्या के बांये हाथ में और वर के सीधे हाथ में पिसी हुई हल्दी को जल से रकाबी में घोलकर लेपे । लोक में जो पीले हाथ करने की बात कही जाती है यह वही बात है । फिर वर के सीधे हाथ में थोडी सी गीली मेंदी और १ चुमन्नी रख उसपर कन्या का बांया हाथ रखकर वर कन्या के दोनों हाथ जोड़ दे । इस विधि से कन्या का पिता अपनी कन्या को वर के हाथ में सौंपता है । इसे पाणि ग्रहण भी कहते हैं । ..¿¿ पाणिग्रहण मंत्र | हारिद्रपंकमवलिप्य सुवासिनीभिदेतं द्वयोर्जनकयोः खलु तौ गृहीत्वा । वामं करं निजसुतावमा पाणिम् लिम्पेद्वरस्य च करद्वययोजनार्थम् ॥ फेरे और सप्तपदी । हथलेवा के बाद वर कन्या को खड़ा करके कन्या को नाये और वर को पीछे रखकर वेदी में चारी के बध्य में Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034887
Book TitleJain Vivah Vidhi aur Vir Nirvanotsav Bahi Muhurt Paddhati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathulal Jain
PublisherDhannalalji Ratanlal Kala
Publication Year1953
Total Pages106
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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