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________________ इस लेख से स्पष्ट पाया जाता है कि हमारा आदित्यनाग गोत्र आचार्य रत्नप्रभसूरि स्थापित महाजन वंश के गोत्र में एक गोत्र है। इन ऊपर लिखित शिलालेखों से स्पष्ट सिद्ध होता है कि चोरड़िया जाति स्वतंत्र गोत्र नहीं पर आदित्यनाग गोत्र की एक शाखा है और इसके स्थापन करने वाले जिनदत्तसूरि नहीं पर जिनदत्तसूरि के जन्म के १५०० वर्ष पूर्व हुए आचार्य रत्नप्रभसूरि हैं। और चोरड़ियों का गच्छ उपकेशगच्छ है। दादाजी के जन्म पूर्व इस आदित्यनाग गोत्र में कई नामी पुरुष हो गुजरे हैं परन्तु इस छोटे से लेख में इतना स्थान नहीं है कि उन सब का नामोल्लेख कर सकूँ। पर केवल भैंसाशाह नाम के चार नररत्न इस गोत्र में हुए हैं, उनका संक्षिप्त परिचय यहाँ दे देता हूँ १-श्रीमान् चन्दनमलजी नागोरी ने ७४॥ शाह का इतिहास "जैन-पत्र” अखबार भावनगर में प्रकाशित करवाया । जिसमें दूसरे नंबर का शाह भैंसा था। आपका गोत्र नागोरीजी ने आदिनाथ लिखा है, पर यह गलती से लिखा गया है। गोत्र था "आदित्यनाग" और इसका समय वि० सं० २०९ का बताया है। नागोरीजी के लेख का कुछ भाग यहाँ उद्धृत कर दिया जाता है: १-रांका वांक सेडादि बलाह गोत्र की शाखाए हैं। २-पोकरणादि मोरख गोत्र की शाखाए हैं। ३-भूरंटादि वीरहट गोत्र की शाखाए हैं । ४-वैद्यमेहतादि श्रेष्टि गोत्र की शाखाए हैं। ५-चोरड़िया गुलेच्छा पारख गदइया वगैरह आदित्यनाग गोत्र की शाखाए हैं। ६-समदड़िया भांडावतादि भादगोत्र की शाखाए हैं। ७-देसरड़ादि चिंचटगोत्र की शाखाए है Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034849
Book TitleHum Choradiya Khartar Nahi Hai
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKesarichand Choradia
PublisherKesarichand Choradia
Publication Year
Total Pages16
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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