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________________ ( २६ ) पएमासा भयदानपुष्टपटहोद् घोषा नघ ध्वसितः कामं कार्यात स्म दृष्ट हृदयो यद्वाक कलारंजितः ॥ १७॥ यदवाचां निचयैर्मुधा कृत सुधा स्वादैरमं 4ः कृता- . . हादः श्रीमदकब्बरः क्षितिपतिः संतुष्टिपुष्ठाशयः त्यक्त्वा तत्करमर्थ सार्थ मतुलं येषां मनः प्रीतये। जैनभ्यः प्रददौ च तीर्थ तिलकं शत्रन्यो वीधिरन ॥२०॥ (शत्र जयप्रशस्ति जै. सा. सं.इ. पृ. ५४३) ॥ अथ दादाजी हीरसूरी पद ॥ ॥राग सारङ्ग ॥ बिजय हीर भये शुभ ध्यान में, ३ . शुद्धष्टि निज प्रातम देखे, परमातम कै ग्यान में । बि. ॥१॥ संयम सुधारस शील का प्याला, छींके अमृत पान में । बि. ॥२॥ सर्माकत पाय मरम सुख पावै, बेठा अविचल थान में । बि. ॥शा अगम अगोचर महिमां तेरी, नहीं पावै अजान में । बि..४॥ घरघर साहिब परचा दीजै, भरमै नहीं जिहांन में । बि. ॥५॥ जिनही पाया तिनही छिपाया, भाखै नही पर कानमें । बि.॥६॥ चेतविजय चपलता छोडौ, भूलो मत अशान में । बि. ॥७॥ ॥ अथ दादा जी का स्तवन ।। श्रीगुरु मेरे हीरसूरीन्द्रजयो गुरु,साहिबमेरोहीरसूरीन्दजयो ॥१॥ श्री जिनशासन उद्योत कारी, श्री गुरु हीर भयो ॥२॥ कुअर पितानाथी देवी माता खीमसरा गोत्र लयो॥श्री ही०॥३॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034847
Book TitleJagadguru Shree Hirvijaysuriji ka Puja Stavanadi Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Kochar
PublisherCharitra Smarak Granthmala
Publication Year1940
Total Pages62
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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