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________________ रहेम नजर सदा राखजोरे; सफल जन्म अम थाय, गुरुदेव ! क्यारे दर्शन हवे आपशोरे. ॥१२॥ गुरु विरह. अलबेलीरे अंबेमात जोवाने जइए-ए राग. सखी ! आव्यो मास आषाढ, विरही गुरुदेवे कर्याः सखी ! उरमा अति उच्चाट, विरही गुरुदेवे कर्या. ए टेक. घन गरजे चपला बहु चमके, थाय अंधारुं घोरजो; गुरुविरही मुज चित्तहुं चमके, करतुं शोर बकोर. वि० ॥१॥ मृदु ठंडा वावलीआ व्हाता, खेडुत अनि हरखायजो; पण तन पर ते नथो स्हेवाता, शरीर अतिवसुकायावरहो०२॥ पृथ्वी उपर पाणी बहु पडतां, नदीओमां वहीजायजो; सद्गुरु विरही मुज मन पाणी, हर्षरहित वहाय. विरही०॥३॥ नथी घरमां गमतुं आ दिवसे, सूनो थयो संसारजो; अतिदुर्लभ गुरुजननी संगत, देती विमल विचार.विरही०॥४॥ नव पल्लववेल्ली थइ रही छे, फूली रह्यां छे फूलजो; पण मुज मन वल्ली मुकाणी, उपजावे अतिशूल. विरही०॥५॥ अन्य जन्ममां आवी मले छे, मात जात ने तातजो; सद्गुरु संगत मलवी कठीन छे, दायक प्रेमप्रभात.विरही०॥६॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034839
Book TitleGurupad Puja
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjitsagarsuri
PublisherShamaldas Tuljaram Shah
Publication Year1926
Total Pages122
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size7 MB
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