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देहान् मृषेति मनुषे यदि तर्हि मोक्षे सिद्धे मुधा किमनुतिष्ठसि साधनानि ? || ३२ ॥ अस्मन्मते तनुभितो निजपुण्य-पापदेहादिभारभृदपारभवाब्धिमग्नः । सम्यक्चरित्र-मति-दर्शन लुप्तभारो
जीवः प्रयात्यनिशमूर्ध्वमियं विमुक्तिः ॥ ३३ ॥ अर्थात् सुख, दुःख, ज्ञान प्रभृति आत्मीयगुण शरीर में ही दिखाई पड़ते हैं, और किसीने भी पूर्वोक्त गुण देह के बहार नहीं देखे, इसलिये यह बात साफ सबूत होती है कि जिसका गुण जहां है, वह भी वहां ही रहता है, याने आत्मा सर्वव्यापी नहीं है किन्तु देहव्यापी याने जितना बडा शरीर है, उत्तना ही परिणाम आत्माका है, और जिस शरीर में आत्मसंयोग है उसीसे उसका बन्ध और मुक्ति है ॥ ३१ ॥ यदि कोई आत्माको सर्वव्यापी माने तो वह आत्मा सर्व शरीर से संयुक्त होनेसे उसको सदैव बन्धन प्रसङ्ग होगा और यदि सब शरीरको मिथ्या माने तो मोक्ष स्वयं सिद्ध है, फिर मोक्ष के लिये कोइ भी अनुष्ठान क्यों करना ? ॥ ३२ ॥ हमारें मतसे आत्मा शरीरपरिमाणी है, और पुण्य पापके भारसे लिप्त है. जब वह सम्यग् ज्ञान, दशर्न, चारित्र को पाता है तब उसकी ऊर्ध्वगति होती है वही विमुक्ति ( मोक्ष ) है ॥ ३३ ॥
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