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________________ आवे, प्रनु विरह शोक दरसावे । निरुत्साह करे सब काम, लेवे वार वार प्रनु नाम ॥प्र० ॥१॥ शुक जलसे प्रनु न्दवरावे, बावनाचंदन चरचावे । जिनवर गणधर मुनि तीन, सुरपति सुर विधि सब कीन ॥ ॥२॥ चय चंदन काष्ठ बनावे, देव अग्नि कुमार जलावे । करे ठमी मेघ कुमार, ग्रहे दाढा हरि आचार ॥प्र०॥३॥ करी पीठ पायुका थापे, कीर्ति जस जगमें व्यापे । श्म जंबू छीप प्रज्ञप्ति, कहे आवश्यक नियुक्ति॥ ॥४॥ करी नंदीश्वर अगर, उत्सव हरि स्वर्गे जाइ। करे जिनदाढाकी सेवा, समकित फल निर्मल लेवा ॥प्र० ॥५॥आतमलक्ष्मी प्रनु हर्षावे, पूजा चौथी पूरण थावे । वबल वर्णन अष्टापदका,सुनी नाश होवे आपदका ॥ प्र० ॥ ६॥ काव्य दशांग धूपधुखायके जवि धूप पूजासे लिये, फल उर्ध्वगति सम धूम दहि निज पाप जवज़ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034755
Book TitleAshtapad Tirth Puja
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVallabhvijay
PublisherHansvijayji Free Library
Publication Year1923
Total Pages54
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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