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________________ “ॐ ह्री श्री कैलासाष्टापदशिखरे श्री सिंहनिषद्या चैत्यालये उत्तरदिशासंस्थित-धर्म १ शांति २ कुंथु ३ अर ४ मल्लि ५ मुनि सुव्रत ६ नमि ७ नेमि ८ पार्श्व ९ वर्द्धमान १० जिन बिंब अत्र अवतर अवतर संबौषट् स्वाहा।" _ [आहान मुद्रासे आह्वान करना " आओ पधारो" कहना] पुनः___"ॐ हो श्री कैलासाष्टापदशिखरे श्री सिंहनिषद्या चैत्यालये उत्तरदिशासंस्थित-धर्म १ शांति २ कुंथु ३ अर ४ मल्लि ५ मुनि सुत्रत ६ नमि ७ नेमि ८ पाच ९ वर्द्धमान १० जिन बिंब अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ठः स्वाहा" (स्थापन मुद्रासे स्थापन करना) पुनः___“ॐ ह्री श्री कैलासाष्टापदशिखरे श्री सिंहनिषद्या चैत्यालये उत्तरदिशासंस्थित-धर्म १ शांति २ कुंथु ३ अर ४ मल्लि ५ मुनिसुव्रत ६ नमि ७ नेमि ८ पाच ९ वर्द्धमान १० जिन बिंब अत्र मम सन्निहितो भव भव ।” (सन्निधापनं कल्याण करो ) इस प्रकार स्थापन करके चारोंही सजोडे अपनी अपनी सामग्री की थाली संभाल लेवें और खडे होकर नीचे स्थापन करी हुई जिन प्रतिमाका अष्ट द्रव्य से पूजन करें तथाहि__ॐ हो श्री कैलासाष्टापदशिखरे श्री सिंहनिषद्या चैत्यालये उत्तरदिशासस्थित-धर्म १ शांति २ कुंथु ३ अर ४ मल्लि ५ मुनि सुत्रत ६ नमि ७ नेमि ८ पार्थ ९ वर्द्धमान Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034755
Book TitleAshtapad Tirth Puja
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVallabhvijay
PublisherHansvijayji Free Library
Publication Year1923
Total Pages54
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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