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उसे वहीं खूब फटकारा और उसका तिरस्कार किया। फिर भी वह सुभट रानीके अनेक प्रकारकी कुचेष्टाएं करता ही जाता। तब तो रानीने अपनी लाज और धर्मको बचाने के हेतु तुरन्त अनशन व्रत धारण कर लिया और अपने सिरके लम्बे केशों द्वारा आत्मघात कर प्राण छोड़ दिये।
यह हाल देख बसुमति घबरा गई और चिल्ला चिल्लाकर रोने लगी। उसके करुण क्रन्दन से सुभट का दिल पिघल गया और उसने मातृहीन उसक न्याको पालन का अभिवचन देकर अपनी पुत्री एवं बहिन बनाकर घर ले आया।
रूप और लावण्य से परिपूर्ण उस कन्याके साथमै सुभटको घरमें पाया देख उसकी स्त्री क्रोधसे ज्वलित हो गई और उसने उस सुभटको खूब ही उलटे हाथ लेना शुरु किया। तब तो वह बसुमतिके प्रति अपने सब अभिवचनाभूल गया और बसुमतिको बाजारमें लाकर एक वेश्याको बेच डाला । बसुमति तो पूर्ण शीलचती थी, वह अपने को वेश्याके हाथ वेची समझ घबराने लगी
और अपने भाग्यको कोसने लगी; क्योंकि वेश्याके यहां उसके शील की रक्षा होना बिलकुल असंभव था। वह मन ही मन नथ्कार मंत्रका जाप जपने लगी और प्रभुसे प्रार्थना करने लगी कि “हे प्रभु ! अब तो मेरे शील की रक्षा के सहायक आप हैं रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये"।
जब बसुमति उस वेश्याके साथ भगवान का स्मरण करती हुई जा रही थी उसी समय बीच में ही कुछ देवताओं ने बन्दरों
का रूप धारण कर उस वेश्या को बुरी तरह नोच खरोंच डाला । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com