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________________ इस घंकार संसार सुख भोगते हुए भगवान महावीर जलकमलबत् संसारमें गृहस्थावास करते रहे। आपका जीवन एक पवित्र योगीकी तरह व्यतिक्रम होता रहा । परम वैरागी होते हुए भी आपने ३० वर्षकी आयुष्य तक दीक्षा न ली। इसका कारण यह था कि अवधिज्ञानसे आपने, अपने ऊपर माता पिता का अतुलनीय मोह देखकर, यह निश्चय कर लिया था कि जबतक माता पिता जीवित रहेंगे तबतक मैं दीक्षा ग्रहण न करूंगा । एतदर्थ गृहस्थावासमें भी आपका जीवन दीक्षित साधुकी तरह ममत्व रहित अवस्था में बीता। नोट-तीर्थकर तो गर्भमें आतेही मति, अति और 'अवधि ये तीन ज्ञानके धारी होते हैं । इसमें अवधिज्ञानसे उसे कहते हैं कि जिसके द्वारा आत्माको अपने तत्कालीन अस्तित्वके समय से पूर्वका सम्पूर्ण ज्ञान हो। दीक्षा “शुद्धातमरस प्रीतरे, कोई बिरला ठाने । निद्रा मोह कषाय न जामे, पुन्यपाप विपरीतरे ।। कोई।। जामे कर्म शुभाशुभ माहि, बंधमाकी रीतरे ॥ कोई ।। दर्शन ज्ञान विकल्प न तामें, शुद्ध चेतना भीतरे । कोई ।। स्वामी सेवक भेद जात नश, रहतहार न जीतरे। कोई ॥ भयेन हैं हैं होत सिद्ध नहि, विन चेतन परतीतरे ।। कोई ॥ प्रीतहोत नश जात भूल चिर, जगस होत अभीतरे ॥ कोई ॥" गो, भ. माला Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034732
Book TitleAntim Tirthankar Ahimsa Pravartak Sargnav Bhagwan Mahavir Sankshipta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGulabchand Vaidmutha
PublisherGulabchand Vaidmutha
Publication Year
Total Pages144
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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