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________________ जीव-विज्ञान आगे कहते हैं-चरम देह वाले और उत्तम देह वालों का सकाल मरण होता है। चरमशरीरी वालों को अन्तिम शरीरी भी कहा जाता है। अर्थात् जिस शरीर से उन्हें नियम से मोक्ष होना है उसे चरमशरीरी कहते हैं। उत्तम देह वाले उन्हें कहते हैं जो त्रेसठ शलाका पुरुषों में आते हैं। इस तरह से जिनका चरम शरीर भी होगा और उत्तम देह भी होगी उन्हीं का सकल मरण होता है। ऐसे भी जीव होते हैं जो चरम शरीरी तो होते हैं लेकिन उत्तम देह वाले नहीं होते हैं। जैसे-पाण्डव चरमशरीरी तो थे लेकिन उत्तम देह वाले नहीं थे। क्योंकि वे त्रेसठ शलाका पुरुषों में नहीं आते थे। ऐसे अनेक और भी हुए है तो जिनके लिए कहा जाएगा कि उनका अकाल मरण भी सम्भव हैं यह नियम तीन पाण्डवों में भी संगत होगा। उत्तम देह वाले भी ऐसे होते हैं जिनकी देह तो उत्तम होती है लेकिन चरम शरीरी नहीं होते हैं। इस तरह इनका भी अकाल मरण सम्भव है। जो जीव चरम शरीरी भी हों और उत्तम देह वाले भी हों उनका अकाल मरण नहीं होता है। जिनकी गिनती त्रेसठ शलाका पुरुषों में भी होती हो और जो चरम शरीरी भी हो उन्हें अकाल मरण से रहित जीव कहा जाएगा। यहाँ यह नियम तीर्थंकरों का बनता है क्योंकि तीर्थंकर त्रेसठ शलाका पुरुषों में भी आते हैं और चरम शरीरी भी होते हैं। वे भी अनपवर्त्य आयु वाले होंगे और अकाल मरण से रहित होंगे। तीसरा विशेषण आता है जिनकी आयु असंख्यात वर्ष की है उनका सकाल मरण होता है। असंख्यात वर्ष की आयु वाले कौन होते हैं?आचार्य कहते हैं जिनकी आयु एक, दो, तीन पल्य की अर्थात् असंख्यात वर्ष की होती है वे भोगभूमि के मनुष्य और तिर्यंच होते हैं। इन सभी के बाद जो भी मनुष्य और तिर्यंच बचे उनका अकाल मरण सम्भव है। ऐसा नियम नहीं है कि अकाल मरण ही होगा लेकिन अकाल मरण के कारण मिलेंगे तो आपका अकाल मरण हो जाएगा। आपका सकाल मरण ही हो ऐसा भी कोई नियामक नहीं हैं। इसलिए जिन जीवों की अचानक दुर्घटना हो जाती है उन दुर्घटनाओं के कारण जिनका मरण हो जाता है उन्हें अकाल मरण से मरा हुआ मानना चाहिए। जिन जीवों का एक्सीडेंट हो जाता है ऐसे स्थानों पर चोट लग जाती है जहाँ से रक्त रूकता नहीं है। उनका भी अकाल मरण मानना चाहिए। __ आचार्य कुंदकुंद देव ने भावपाहुड़ की गाथा में कहा है- “रक्त के क्षय से भी अकाल मरण हो जाता है। फिर उन्होंने लिखा है वेदना। ऐसी तीव्र वेदना हो जाए जिसके कारण आपको मरना पड़ जाए, वह भी आपका तीव्र वेदना से अकाल मरण कहलाएगा। श्वास को रोक देने से तथा गला घोंट देने से भी अकाल मरण सम्भव है। अतिसंक्लेश परिणामों से भी आपका अकाल मरण हो सकता है। कई बार कर्ज बढ़ जाने आदि से Depression में आ जाने पर भी अकाल मरण हो जाता है। ये सभी 86
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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