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________________ जीव-विज्ञान से आप स्वयं को कभी भी तिर्यंच जैसा अनुभव नहीं कर पाओगे, न देव जैसा अनुभव करोंगे। कैसा अनुभव करोगे?मनुष्य रूप में ही अनुभव करोगे। यह गति नाम कर्म का उदय है। नाम-कर्मों में भी एक जीवविपाकी कर्म कहलाते हैं, जो जीव में ही अपना फल देते हैं, जो जीव में ही भाव उत्पन्न कराते हैं। गति आदि जितने भी ये भाव बताये जा रहे हैं वे सभी जीवविपाकी कर्म हैं, उनका फल जीव में ही मिलता है। कुछ औदयिक-भाव ऐसे हैं जिनसे हम अभी वर्तमान में पुरुषार्थ करके भी छूट नहीं सकते हैं, उन्हीं में यह गति नाम-कर्म है। कषाय चार होती हैं-क्रोध, मान, माया और लोभ । ये चार कषाय भी औदयिकभाव हैं। औदयिक भाव का अर्थ-कर्म के उदय से आत्मा में ऐसे भाव आ जाना कि आत्मा को लगे ही नहीं कि मैं अलग हूँ और कषायें अलग हैं। क्रोध करने वाला, मैंने गुस्सा किया, वह उस समय क्रोधमय हो जाता है। मान करने वाला अहंकार मय हो जाता है। मायाचारी करने वाला,लोभ करने वाला इन कषायमय हो जाता है। वह इन कषायों में ही स्वयं को अनुभव करता है। इसलिए इनको औदयिकभाव कहा गया है। इन कषायों के भावों को आप अपने पुरुषार्थ से कम कर सकते है, जीत सकते हैं। इन कषायों के उदय को आप अपने पुरुषार्थ से अपने को बचा सकते हो। इसलिए इनसे तो हम बच सकते हैं, लेकिन जो गति आदि कर्म हैं इनसे बचना कठिन होता है। उनसे कोई अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि अन्तर तो कषाय आदि भावों से पड़ता है। इसलिए यह कषाय भी औदयिक-भाव है। अर्थात कर्म के उदय से आत्मा में उत्पन्न होने वाले भाव। लिंग-लिंग तीन होते हैं-स्त्रीलिंग, पुरुष-लिंग और नंपुसकलिंग। कर्म के उदय से उत्पन्न होने वाले भाव-लिंग की यहाँ पर व्यवस्था है। अगर आप पुरुष हैं तो आपमें पुरुष का ही भाव रहेगा, मनुष्य गति को पाकर आपने स्त्री पर्याय को प्राप्त कर लिया तो आपके अंदर स्त्री का ही भाव रहेगा वह उस भाव से बच नहीं पाएंगे। आप भले ही दुनिया में कहो कि स्त्री भी पुरुष के समान हैं, कोई किसी से कम नहीं है, लेकिन इन औदयिक भावों में जब तक आप रहोगे तब तक आपमें समानता कभी भी नहीं आ सकती। स्त्री होगी तो स्त्रीगत भाव उसमें रहेंगे, पुरुष होगा तो पुरुषगत भाव उसमें रहेगा। हम कितना भी उनकी समानता करना चाहे, वह समानता कर नहीं सकते। अगर वह समानता हो सकती है तो ज्ञान के रूप में हो सकती हैं। पाँच लब्धियाँ जो पहले बताई हैं उसमें हो सकती है लेकिन इन औदयिक भावों में कभी भी समानता नहीं हो सकती है। जैसे-आपने M.B.B.S. किया उस स्त्री ने भी कर लिया, आप Pilot बन गये वो भी Pilot बन गई, आप Everest पर चढ़ सकते हैं तो वो भी चढ़ सकती है। ये सभी भाव ऊपर के क्षयोपशम भाव से हो रहे हैं। स्त्री है तो स्त्री का ही भाव रहेगा, पुरुष है तो पुरुषगत भाव रहेगा ये भाव इन वेदों के कारण आत्मा में उत्पन्न होते हैं। इन्हीं औदयिक-भावों का हमें अनुभव होता है। मिथ्यादर्शन-यह मिथ्यादर्शन का भाव है जो मिथ्यात्व कर्म के उदय से आत्मा में उत्पन्न होता है। मिथ्यात्व कर्म के उदय से उत्पन्न हुआ भाव, आत्मा का औदयिक-भाव है। 24
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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