SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 13
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम सूत्र १७, उपांगसूत्र-६, 'चन्द्रप्रज्ञप्ति' प्राभृत/प्राभृतप्राभृत/सूत्र प्राभृत-२ प्राभृतप्राभृत-३ सूत्र - ३७ - हे भगवन् ! कितने क्षेत्र में सूर्य एकएक मुहूर्त में गमन करता है ? इस विषय में चार प्रतिपत्तियाँ हैं । (१) सूर्य एक-एक मुहूर्त में छ-छ हजार योजन गमन करता है । (२) पाँच-पाँच हजार योजन बताता है । (३) चार-चार हजार योजन कहता है । (४) सूर्य एक-एक मुहूर्त में छह या पाँच या चार हजार योजन गमन करता है जो यह कहते हैं कि एक-एक मुहूर्त में सूर्य छ-छ हजार योजन गति करते हैं उनके मतानुसार जब सूर्य सर्वाभ्यन्तर मंडल से गमन करता है तब उत्कृष्ट अट्ठारह मुहूर्त का दिन और जघन्या बारह मुहूर्त की रात्रि होती है, उन दिनों में १०८००० योजन प्रमाण तापक्षेत्र होता है, जब वह सूर्य सर्वबाह्य मंडल में गमन करता है तब उत्कृष्ट अट्ठारह मुहर्त की रात्रि और जघन्य बारह मुहूर्त का दिन होता है और ७२००० योजन का तापक्षेत्र होता है। जो सूर्य का गमन पाँच-पाँच हजार योजन का एक मुहूर्त में बतलाते हैं वह यह कहते हैं कि सूर्य सर्वाभ्य-न्तर मंडल से उपसंक्रमण करके गति करता है तब रात्रिदिन का प्रमाण पूर्ववत् है, लेकिन तापक्षेत्र ९०००० योजन होता है । जब सर्वबाह्य मंडल में गति करता है तब तापक्षेत्र ६०,००० योजन हो जाता है । जो मतवादी चार-चार हजार योजन का गमनक्षेत्र कहते हैं, वह सर्वाभ्यन्तर मंडल में सूर्य का तापक्षेत्र ७२,००० योजन का कहते हैं और सर्वबाह्य मंडल में ४८,००० योजन का तापक्षेत्र बताते हैं, लेकिन रात्रिदिन का प्रमाण पूर्ववत् ही है। जो एक महर्त्त में सर्य का गमन छह-पाँच या चार हजार योजन बताते हैं. वह यह कहते हैं कि सर्य उदय और अस्त काल में शीघ्रगतिवाला होता है, तब वह छह-छह हजार योजन एकमुहूर्त में गति करता है; फिर वह मध्यम तापक्षेत्र को प्राप्त करते करते मध्यमगतिवाला होता जाता है, तब वह पाँच-पाँच हजार योजन एक मुहूर्त में गति करता है, जब पूर्णतया मध्यम तापक्षेत्र को प्राप्त हो जाता है तब वह मंदगतिवाला होकर एक मुहूर्त में चार-चार हजार योजन गति करता है । ऐसा कहने का हेतु यह है कि यह जंबूद्वीप चारों ओर से सभी द्वीपसमुद्रों से घीरा हुआ है, जब सर्वाभ्यन्तर मंडल से उपसंक्रमण करके सूर्य गमन करता है, उन दिनों में तापक्षेत्र ९१००० योजन का होता है और सर्वबाह्य मंडल में गमन करता है तब तापक्षेत्र ६१००० योजन का होता है, रात्रि दिन का प्रमाण पूर्ववत् ही होता है। भगवंत फरमाते हैं कि सूर्य एक मुहर्त में सातिरेक पाँच-पाँच हजार योजन की गति करता है । जब सूर्य सर्वाभ्यन्तर मंडल से संक्रमण करके गति करता है तब पाँच-पाँच हजार योजन एवं २५१ योजन तथा एक योजन का उनतीस षष्ठ्यंश भाग प्रमाण से एकएक मुहूर्त में गति करते हैं । उस समय में यहाँ रहे हुए मनुष्यों को ४७२६३ एवं एक योजन के एकवीश एकसट्ठांश भाग प्रमाण से सूर्य दृष्टिगोचर होता है । रात्रिदिन पूर्ववत् जानना । निष्क्रमण करता हुआ सूर्य नए संवत्सर में प्रथम अहोरात्र में अभ्यन्तर मंडल से उपसंक्रमण करके अनन्तर दूसरे मंडल में गति करता है, तब ५२५१ योजन एवं एक योजन के सत्तचत्तालीश षष्ठ्यंश भाग एकएक मुहूर्त में गमन करता है, तब ५५२१ योजन एवं एक योजन के सत्तचत्तालीश षष्ठ्यंश भाग एकएक मुहूर्त में गमन करता है, उस समय यहाँ रहे हुए मनुष्यों को ४७१७९ योजन एवं एक योजन के सत्तावनषष्ठ्यंश भाग तथा साठ भाग को एकसठ से छेदकर उन्नीस चूर्णिका भाग से सूर्य दृष्टिगोचर होता है। रात्रिदिन का प्रमाण पूर्ववत् जानना । निष्क्रमण करता हुआ वही सूर्य दूसरे अहोरात्र में तीसरे मंडल में उपसंक्रमण करके भ्रमण करता है तब ५२५२ योजन एवं एक योजन के पाँच षष्ठ्यंश भाग एक एक मुहूर्त में जाता है, उस समय यहाँ रहे हुए मनुष्यों को ४७०९६ योजन एवं एक योजन के तेईस षष्ठ्यंश भाग तथा साठ के एक भाग को एकसठ से छेदकर दो चूर्णिका भाग से सूर्य दृष्टिगोचर होता है । इसी प्रकार से निष्क्रमण करता हुआ सूर्य तद्अनन्तर-अनन्तर मंडलों में गति करता है, तब एक योजन के अट्ठारह-अट्ठारह साठ भाग से एकएक मंडल में मुहूर्त गति को बढ़ाते बढ़ाते ८४ योजनो में किंचित् न्यून पुरुषछाया की हानि करते-करते सर्वबाह्य मंडल में गति करता है । जब वह सर्वबाह्य मंडल में गमन करता है, तब ५३०५ योजन एवं एक योजन के पन्द्रह षष्ठ्यंश भाग एक एक मुहूर्त में गमन करता है, उस समय यहाँ रहे हुए मनुष्यों को ३१८३१ योजन एवं एक योजन के तीस षष्ठ्यंश भाग प्रमाण से सूर्य दृष्टिगोचर होता है । उस समय उत्कृष्ट अट्ठारह मुनि दीपरत्नसागर कृत्" (चन्द्रप्रज्ञप्ति) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 13
SR No.034684
Book TitleAgam 17 Chandrapragnapti Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages52
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 17, & agam_chandrapragnapti
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy