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________________ (५) पूजा कीधी, त्यां जेणेरूपे कहेतां व्य अरिहंतरूपे जाणी पूजी ॥ एतावता अवस्था विशेष विचारी तेवी. पूजा कीधी, तेणेरूपे हमणां नथी, एतावता हमणां जे महाव्रतधारी साधु तेने वर्तमानकाले तेणे रूपे कहेता ठयारिहंतरूपे नथी ॥ एतावता साधुने व्यवहारे दीक्षावस्था वंदनीय जाणीये डीये. दीक्षावस्थाये अव्य पूजानी विधि नथी दीसती जे कारणे नमुण्थुगंनो अधिकारी जेवारे गृहस्थ हुओ त्रीजी निसीही कीधा पली, तेवारे ते गृहस्थपण अव्य पूजा न करे तो यतिनुं झुं कहे ? ॥५॥ .. श्रही कोइ चालना करेजे जगवंतने समवसरणे देवताये फूलना पगर नर्या, तथा राजाये नगर समरा व्या, ए नगवंतनी व्यपूजा जावावस्थाये दीसे . ते . प्रत्ये उत्तर-ए फूलपगर, नगर समराववादिग्लुिनने अर्थे कांर नहीं, इंहा जगवंतने नोग्य वे नहीं एवं जाणवू ॥३॥ हवे को कहेशे साधुने अठ्यारित वंदनीय बे, तो अव्यपूजानो शो विरोध ? ते उपर कही ये बीये जे श्रावक बने साधु तीर्थंकरदेवे दीक्षा लीधी ते वार पड़ी ज्यवहारे वांदे. एतावता जे उत्सर्गमार्गे प्रतिमाधरा. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034619
Book TitleSudharm Gaccha Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBramharshi Muni
PublisherRavji Desar
Publication Year1912
Total Pages94
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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