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________________ ॥ श्री गुरुग्यो नमः॥ ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ॥ नित्यानन्द पद प्रयाण सरणी श्रेयोवनी सारणी संसारार्णव तारणैक तरणी विद्यार्षि विस्तारिणी ॥ . पूण्यांकूरजर प्ररोह धरणी व्यामोह संहारिणी प्रीत्यैकस्य न तेऽखिलाहिरणी मूर्तिमनोहारिणी ॥१॥ ॥श्री जिननावपूजानक्ति परमार्थ स्वाध्याय ॥ रोग रामगिरि ।। श्री जिन जीव सहुनी वेदन, थापण समवड तोले ।। हृदय नयण जन जोवो जुगते, ते हिंसा केम बोले ।। कुगुरुतणे उपदेशे जूला, जोला नक्ति न जाणे ॥ थापी प्रतिमा अरिहंतनावे, अरिहंतनी मति नाणे ॥ साधु नक्ति गृहवासी सरीखी, ए असमजत दीसे ॥ पानी नेत्रि जयो नम नारि, जाणुं विश्वाधिसे ।। || गुरु०॥३॥ प्रथम तीर्थकर संजम लीधे, नूमंडल विदरतो । विणु श्रेयांस अवर जन केरी, न दुइ नक्ति करतां ॥ ॥ कुगुरु० ॥३॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034619
Book TitleSudharm Gaccha Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBramharshi Muni
PublisherRavji Desar
Publication Year1912
Total Pages94
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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